वाराणसी। 21 मार्च के दिन ही सूर्य उत्तर गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। इसलिए 21 मार्च को दिन-रात बराबर होगा जबकि 22 मार्च से दिन बड़ा व रात छोटी होने लगती है। इसके अलावा 23 सितंबर को भी पूरे विश्व में दिन-रात बराबर होते हैं।
विषुव दिवस अर्थात 21 मार्च व 23 सितंबर को जब सूर्य विषुवत रेखा अर्थात भूमध्य रेखा पर लंबवत चमकता है, इन दिनों पर मध्याह्न में 12 अंगुल शंकु समतल जमीन पर रखकर मध्याह्न के समय में इस शंकु की छाया की लंबाई पलभा या अक्षभा होगी। पलभा को अंगुल में भी लिखते हैं। वास्तव में स्थान विशेष पर सूर्य की किरणों का तिरछापन हम पलभा से जान सकते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि धूप घड़ी के शंकु की उस समय की छाया की चौड़ाई जब मेष या तुला संक्रांति के मध्याह्न में सूर्य ठीक विषुवत रेखा पर होता है, उसे पलभा कहते हैं। अगर इसको नापना है तो इसके लिए हाथी के दांत या अन्य शुद्ध परिपक्व लकड़ी, जिसमें मुख्यत: शीशम की लकड़ी आदि से 12 अंगुल की नाप का एक शंकु यंत्र बनाया जाता है। शंकु के आधार पर अक्षांश की गणना और दिशा की गणना की जाती थी। शंकु की छाया को हम पलभा या अक्षभा भी कहते हैं। शंकु की छाया से अक्षभा या पलभा की गणना की जाती है। शंकु छाया से मात्र अक्षांश व रेखांश ही नहीं बल्कि दिशा ज्ञान, सूर्य स्पष्ट भी सही रूप में किया जा सकता है।