वाराणसी। वर्ष 2000 काशी की बुनकरी की हालत खस्ता होने लगी थी। 2005 में स्थिति तब और भयावह हो गई जब बनारसी के नाम पर चीन के हूबहू उत्पाद बेहद कम दाम पर देश में बिकने लगे। बुनकर रोजगार खोकर पलायन करने लगे। ऐसे में डॉ. रजनीकांत काशी की बुनकरी को बचाने के लिए थलाइवा (नेतृत्व कर्ता) बनकर आए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनाइटेड नेशन कांफ्रेंस ऑन ट्रेड डेवलपमेंट के साथ मिलकर काम शुरू किया।
तय हुआ कि बनारसी साड़ी को ग्लोबल इंडिकेशन (जीआई) दिलाया जाए। छह माह की मेहनत के बाद दस्तावेज तैयार कर 2007 में चेन्नई के जीआई रजिस्ट्री कोर्ट में फाइल किये। दो साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सितंबर 2009 में बनारस ब्रोकेड और साड़ी को जीआई का पंजीकरण मिला। डॉ. रजनीकांत की संस्था ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन ने 1993 से महाजन के चंगुल में फंसी भूमिहीन महिलाओं के लिए लड़ाई शुरू की थी। गरीब बच्चों खासकर बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ा। चिरईगांव, अराजीलाइन, चोलापुर, विद्यापीठ ब्लाक सहित विभिन्न क्षेत्रों में 360 महिला स्वयं सहायता समूह बनाए। इनसे 3750 महिलाएं जुड़ी हैं। डॉ. रजनीकांत ने बताया कि बुनकरी के बाद भदोही के कालीन, मिर्जापुर की दरी, लकड़ी के खिलौने, गुलाबी मीनाकारी सहित 10 उत्पादों का जीआई कराया। अभी और सात उत्पादों को जीआई दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।
पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद डॉ. रजनीकांत को बधाई देने के लिए उनके घर पर लोगों का तांता लगा रहा। काशी और गोरखपुर क्षेत्र के लोकसभा प्रभारी सुनील ओझा और राज्यमंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी के घर पहुंचे और उनका सम्मान किया।