वाराणसी। समृद्ध भारत न्यास के डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी के पेटेंट कराए बैल ऊर्जा के बारे में जानकारी जुटाने शुक्रवार को पंचकूला से दो सदस्य चांदपुर इंडस्ट्रियल इस्टेट पहुंचे। पंचकूला गोशाला ट्रस्ट से आए इंजीनियर ऋषिपाल और सत्यवीर ने बताया कि हरियाणा में बैल नहीं बनने से बछड़े सड़कों पर घूम रहे हैं और बड़े होकर सांड़ बन रहे हैं। सांड़ों से किसान की फसलों को खतरा बना हुआ है। बैलों के इस्तेमाल के लिए बैल ऊर्जा के बारे में जानकारियां जुटाने आए हैं।
डॉ. वाचस्पति ने बताया कि इस समय सांड़ों की संख्या बढ़ रही है जबकि बैल समाप्त हो रहे हैं। मशीनों के इस्तेमाल बढ़ने से बैलों को कोई रखना नहीं चाह रहा है। उन्होंने गांव के विकास के लिए बैल का होना आवश्यक बताया। इसे ध्यान में रखकर बैल ऊर्जा तकनीक इजाद की गई है। हरियाणा के न्यू एंड रिन्यूवल ऊर्जा के मुख्य सचिव अंकुर गुप्ता की पहल पर यहां लोग आए हैं। बनारस में बैल ऊर्जा को प्रमोट करने के लिए कमिश्नर को पत्रक दिया था। बीएचयू के आईआईटी के निदेशक को भी इसकी जानकारी दी गई है लेकिन कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। इसके इस्तेमाल से किसानों की आय दूनी होगी और फसल नुकसान का खतरा खत्म हो जाएगा।
क्या है ‘बैल ऊर्जा’
मशीन को दो बैल चलाते हैं। इसके चलाने से जो ऊर्जा प्राप्त होती है। उसे ‘बैल ऊर्जा’ कहते हैं। गेयर और जड़त्व के सिद्धांत पर इस मशीन को बैल की सहायता से चलाते है। इससे जो ऊर्जा निकलती है उसे बैटरी में स्टोर करके भी इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं। पांच से छह घंटे बैलों के परिश्रम से निकलने वाली ऊर्जा नौ हार्स पावर होती है। मशीन में तकनीकी विकास कर इसे 20 हार्स पावर तक पहुंचाया जा सकता है।