'15 जून की रात से ही तेज बारिश हो रही थी। सुबह भी ये सिलसिला जारी रहा। पानी का बहाव तेज होता गया। 16 जून की सुबह करीब 6:15 बजे होटल खाली करने की चेतावनी दे दी गई।'
'लोग संभल पाते कि एक जलजला आया। रामबाड़ा में बने होटल की पूरी इमारत देखते ही देखते पानी में समा गई। मैं और मेरा परिवार भी उसकी चपेट में आ गया। इस बीच मेरे हाथ में पेड़ की जड़ आ गई।'
'उसे थामकर मैं पहाड़ी पर चढ़ गया, लेकिन मेरी मां, पिता और दोनों बहनें सैलाब में बह गईं। लोग उनके जिंदा होने की सांत्वना दे रहे थे लेकिन मेरा दिल यकीन नहीं कर पा रहा था। आखिर आंखों के सामने ही उनको सैलाब में बहते देखा है।'
उत्तराखंड में तबाही का मंजर
यह बताते-बताते पारा के मरदन खेड़ा निवासी आशीष शर्मा का चेहरा भावहीन था लेकिन आंखों से आंसू बह रहे थे। जाहिर हो रहा था कि बीते दिनों में उन्होंने जो झेला और देखा है, अब उससे कुछ और बुरा देखने को शायद ही मिले।
आशीष कहते हैं कि जब वह बचकर पहाड़ी पर पहुंचे तो चीख-चीखकर रोने का दिल कर रहा था, लेकिन वह भी नहीं कर पा रहे थे। वहां जिंदगियों के साथ हर कदम पर इंसानियत को भी दम तोड़ते देखा। आपदा के बाद वहां कई लोग लूटपाट और मारकाट पर उतर आए।
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आशीष ने बताया कि उनके होटल में एक महिला ने पायजेब पहनी हुई थी। लुटेरे से जब पायजेब नहीं उतरी तो वह महिला का पैर ही काटकर ले गया। लाशों के बीच गुजरते समय ऐसे कई मौके आए। सामानों की खुलेआम लूट हो रही थी और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ था।
तय थी बहन की शादी
आशीष की बड़ी बहन रोमा उर्फ पूजा की शादी हाल ही कानपुर से होनी तय हुई थी। वह तूड़ियागंज आयुर्वेदिक कॉलेज में नर्स थी। छोटी बहन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर शकुंतला मिश्रा विकलांग विश्वविद्यालय में नर्स की नौकरी कर रही थी।
हादसे के बाद अब आशीष परिवार में अकेले बचे हैं। घर उन्हें काटने को दौड़ रहा है। रविवार को हालांकि मिलने वालों का तांता लगा रहा, लेकिन आशीष जानते हैं कि आने वाले दिन काफी कठिन साबित होंगे।
बिना खाए-पिए चार दिन तक भटका
आशीष के मुताबिक चार दिन तक वे बिना कुछ खाए-पिए उसी इलाके में फंसे रहे। किसी तरह की मदद नहीं मिलने पर खुद ही वहां से निकलने की सोची। साथ में सात-आठ लोग और थे। दो दिन तक पहाड़ों पर बिखरी पड़ी लाशों के बीच चलते रहे। थकने पर पॉलिथीन ओढ़कर सोए। प्यास लगने पर गंदा पानी पिया। खाने के लिए कुछ था ही नहीं।
चौथे दिन सेना के एक हेलीकॉप्टर ने उन लोगों को बाहर निकाला। वहां से एक गाड़ी में सवार होकर हरिद्वार के रास्ते मुरादाबाद तक आए। मुरादाबाद आने के बाद एक बार फिर कुछ उम्मीद के साथ परिवार को तलाशने उत्तराखंड गए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।