उत्तर प्रदेश के तराई इलाके को 'बाउल ऑफ शुगर' के नाम से जाना जाता है। दरअसल यहां गन्ने की पैदावार इतनी ज्यादा है कि गन्ना किसानों की बदौलत उत्तर प्रदेश के इस इलाके में चुनावों को साधा जाता है। लेकिन अब यही गन्ना उत्तर प्रदेश के चुनावी गणित को बिगाड़ रहा है। दरअसल इस जिले में निजी चीनी मिलें किसानों को बकाया भुगतान नहीं कर रही हैं। इससे नाराज किसानों ने मिलों पर तालाबंदी कर दी है। मजबूर और लाचार गरीब किसान गन्ने के तय सरकारी रेट की तुलना में तकरीबन सौ से सवा सौ रुपये कम कीमत पर कोल्हू, बेल और क्रेशर पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर हैं।
लखीमपुर से दिल्ली को जोड़ने वाले स्टेट हाईवे पर एक गांव पड़ता है सिकंदराबाद। इस गांव और आसपास में तकरीबन चार सौ से ज्यादा कोल्हू और बेल जैसे छोटे उद्योग स्थापित हैं। गांव के सरन त्रिवेदी की बेल पर कई किसान अपना गन्ना बेचने के लिए खड़े हुए थे। गन्ना बेचने आए किसान अनूप कहते हैं कि जब चीनी मिलें उनका पेमेंट नहीं कर रही हैं, तो उन्हें गन्ना बेचने का कोई फायदा नहीं। अनूप के मुताबिक यहां पर कम कीमत पर गन्ने को बेचकर उसका नगद भुगतान तो लिया जा सकता है। वे कहते हैं कि जनवरी में उनकी बहन की शादी है, और पैसे की जरूरत है। लेकिन निजी चीनी मिल में पिछले साल के ही बेचे गए गन्ने का भुगतान नहीं हो पाया है। ऐसे में उनका अपनी फसल को औने-पौने दामों पर बेचना मजबूरी हो जाता है। क्योंकि घर में कार्यक्रम है और पैसा है नहीं। वे कहते हैं कि यहां पर उन्हें एक क्विंटल गन्ने के बदले 250 रुपये मिलते हैं। जबकि यही फसल अगर आप चीनी मिल में बेचते हैं तो उसकी कीमत सरकार की ओर से तय की गई साढ़े तीन सौ रुपये प्रति क्विंटल मिलती है। वह कहते हैं कि दरअसल सरकार भुगतान करवाने में फेल हो गई है। स्थानीय भाजपा विधायकों की चीनी मिल सुन नहीं रही हैं। किसान लगातार नेताओं और सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि उनका बकाया भुगतान दिया जाए। लेकिन मिलें न तो सरकार की सुन रही हैं और न ही अफसरों की। कुल मिलाकर किसान बीच में पिस रहा है। वह कहते हैं चुनावी दौर में यह संकेत अच्छे नहीं हैं।
सिकंदराबाद के इसी कोल्हू पर अपना गन्ना बेचने आए गांव के मनोहर लाल बहुत ही नाराज हैं। मनोहर कहते हैं कि वह हमेशा से भाजपा के समर्थक रहे हैं। उन्होंने भाजपा को तन, मन और धन से हमेशा समर्थन किया लेकिन जब उनकी फसल का ही भुगतान नहीं हो पा रहा है और सरकार भी उनकी नहीं सुन रही है, तो अब वे पार्टी बदलने का मन बना रहे हैं। वे कहते हैं जब उनकी सरकार और जिम्मेदार नेता अधिकारी निजी मिल मालिकों से उनकी फसल का भुगतान नहीं करवा सकते तो यह सरकार रहने लायक नहीं है। मनोहर के मुताबिक गन्ने का किसान खून के आंसू रो रहा है। वह फसल सिर्फ इसी आश्वासन पर बोता है कि उसे सरकार के तय रेट मिलेंगे लेकिन सरकार और जिम्मेदार अधिकारी चीनी मिल मालिकों के आगे झुक जाती हैं। नतीजतन किसान बर्बादी की ओर चला जाता है। वे कहते हैं कि किसान मजबूर होकर कोल्हू और बेल पर जाकर अपना गन्ना बेचता है। यहां उसको वाजिब कीमत नहीं मिल पाती है। अगर सरकार किसानों की असली हितैषी है, तो बकाया भुगतान कराए और किसानों को उनका हक दिलाए।
यहां के कोल्हू उद्योग संघ के सचिव हरिराम त्रिवेदी कहते हैं कि उनके पूरे इस इलाके में और जलालपुर इलाके में तकरीबन एक हजार छोटे-बड़े उद्योग हैं, जहां पर किसानों से गन्ना खरीदा जाता है और फिर गुड़ बनाने की प्रक्रिया की जाती है। त्रिवेदी के मुताबिक वह किसानों को ढाई सौ रुपये प्रति कुंटल तक का भुगतान करते हैं। उनका कहना है कि कुछ कोल्हू मालिक तो सवा दो सौ रुपये प्रति कुंटल तक भुगतान करते हैं। इस सवाल पर कि यह कीमत सरकार के तय रेट से तो बहुत कम है, तो त्रिवेदी का कहना है कि वह उतना भुगतान नहीं कर सकते क्योंकि उनकी लागत ही नहीं आती है। कोल्हू उद्योग संघ के आंकड़ों के मुताबिक इस इलाके में एक कोल्हू रोजाना तकरीबन दो सौ कुंटल की पेराई करता है। ऐसे में इतने कुंटल का भुगतान भी रोजाना किसानों को करना पड़ता है। वे कहते हैं कि उनके पास स्थानीय किसान सिर्फ इसीलिए आता है कि उसका गन्ना बड़ी शुगर मिलों पर नहीं खरीदा जा रहा है और भुगतान न होने के चलते किसान उन मिलों की ओर रुख नहीं करता है। वे कहते हैं किसान खुश तो नहीं होता है, लेकिन उसे कुछ पैसा जरूर मिल जाता है और उनका उद्योग भी चलता रहता है।
चीनी मिल की बजाय कोल्हू पर गन्ना बेचने आए किसान रतन कहते हैं कि गोला के स्थानीय विधायक ने तो चीनी मिल के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज करा दी है। बावजूद इसके उनका बकाया भुगतान नहीं हो पा रहा है। किसानों का आंदोलन मिलों के बाहर लगातार चल रहा है। वे कहते हैं कि जब सरकार के नुमाइंदे कोई मदद करने लायक नहीं हैं तो उनसे मदद की गुहार लगाना भी बेकार है। ऐसे में बेहतर है कि कम कीमत पर अपनी फसल को दूसरी जगह बेच दें, ताकि कुछ पैसा तो आ सके और उनका घर-परिवार चल सके। रतन कहते हैं कि पिछले महीने ही उनकी भतीजी की शादी हुई। उन्होंने सोचा था कि गन्ने का बकाया भुगतान चीनी मिल से हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजतन उन्हें कर्ज लेकर शादी करनी पड़ी। वे कहते हैं कि ऐसी सरकार का क्या फायदा जो किसान को कर्ज में डाल रही है। वह भी तब जब उसका जायज पैसा मिल मालिकों के पास फंसा हुआ है। सरकार को चाहिए कि किसानों का बकाया भुगतान जल्द से जल्द करवाया, अगर ऐसा नहीं होता है तो आने वाले विधानसभा चुनाव में निश्चित तौर पर उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।
गोला चीनी मिल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने वाले भाजपा विधायक अरविंद गिरी कहते हैं कि उनकी सरकार ने किसानों के बकाया भुगतान के लिए चीनी मिल मालिकों को एक बड़ी रकम मुहैया कराई। ज्यादातर चीनी मिलों ने किसानों का बकाया भुगतान कर भी दिया, लेकिन तराई में ऐसा नहीं हो सका। वह कहते हैं कि यह मिल मालिक उनकी सरकार की छवि खराब कर रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने मिल प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। उनके इलाके का किसान जब उनके पास आता है, तो यही दुख-दर्द लेकर बैठता है कि उसका भुगतान क्यों नहीं हो रहा है। विधायक गिरी के मुताबिक गोला मिल ने किसानों का भुगतान नहीं किया। इसी वजह से उनको कानूनी रास्ता अख्तियार करना पड़ा।