उन्नाव। वसंत पर्व ज्ञान की देवी मां सरस्वती का जन्म दिन है। पुरातन से देखा जाए तो आदिकाल से मनुष्य को इसी शुभ अवसर पर विद्या बुद्धि का ज्ञान व संवेदना का अनुदान मिला था।
इसी दिन से मौसम में परिवर्तन के साथ ही पेड़ों में नई कोपलें, पौधों में नए फूल और आम की अमराई में मंजरियों की सुगंध वातावरण में एक अलौकिक मस्ती भर उठती है। यही नहीं कोयल की आवाज भी उन्मुक्त हो उठती है। साथ ही फगवा बयार भी प्रारंभ हो जाती है।
प्रकृति इन दिनों अपने आंतरिक उल्लास को उभारती है। इस दिन महिलाएं पीले परिधानों को पहनकर पूजा करती हैं। वसंत मां सरस्वती का सेवक था। इसलिए वह अपने किसी कार्य से पहले मां की ही पूजा करता था।
इसलिए वह परंपरा आज तक चली आ रही है। वसंत ऋतु प्रारंभ होते ही विद्यादायनी मां सरस्वती की पूजा अर्चना पहले की जाती है। इसीलिए वासंतिक ऋतु में मां का अलग स्थान है।
वसंत ऋतु में इसलिए होता है पीले रंग का महत्व
आचार्य गिरीश कुमार तिवारी की माने तो वसंत ऋतु प्रारंभ होते ही सरसों के पौधों में पीले फूल आ जाते हैं। आम के बौर के फूल भी पीले निकलते हैं। इतना ही नहीं हवा का रुख भी वासंतिक हो जाता है और हवा में गरमाहट आ जाती है। यह ऋतु चालीस दिन की होती है। इसमें वर्ष की हर ऋतु से आठ-आठ दिन काटकर चालीस दिन बनाए जाते हैं।
इस दिन हो सके तो पीले वस्त्र को धारण करके ही पूजा करनी चाहिए। माता गौरी व बाबा गणेश की मूर्ति रखने के साथ नौ ग्रहों का पूजन अर्चन करना चाहिए। बाद में माता के मंत्रों के माध्यम से विधिवत पूजा करनी चाहिए। इस दिन मां सरस्वती के पूजन का विशेष महत्व होता है।
चालीस दिन शुभ
आचार्य गिरीश कुमार तिवारी की माने तो मां सरस्वती का दिन होने के कारण यह शुभ दिन माना जाता है। इस ऋतु के चालीस दिन रहने के कारण चैत्र के नवरात्र तक अच्छे कार्य लोग कर सकते हैं। यह चालीस दिन किसी भी अच्छे कार्य के लिए बहुत ही शुभ माने जाते हैं।