उन्नाव। गरीबों को पक्के आवास का लाभ देने के लिए चलाई जा रही प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी और ग्रामीण) में भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। परिणामस्वरूप जिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों ने अवैध वसूली करके दोनों योजनाओं में भारी संख्या में अपात्रों को शामिल कर लिया। पूर्व में जांच में दोनों योजनाओं में साढ़े तीन हजार से अधिक अपात्रों को योजनाओं का लाभ देने की पुष्टि हुई।
केंद्र सरकार ने शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के बेघर व कच्चे घरों में रहने वाले गरीबों को पक्का आवास देने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना चलाई। ग्रामीण आवास योजना में जहां लाभार्थियों का चयन 2011 में हुई सामाजिक, आर्थिक जनगणना से करने की व्यवस्था थी। वहीं, शहरी आवास में निकायों में रहने वाले ऐसे व्यक्ति जो भूमि होने के बाद भी झोपड़ी या कच्चे मकान में रह रहे हैं, उन गरीब पात्रों को सरकार ने प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत पक्का मकान बनाने के लिए अनुदान देने की व्यवस्था की। हालांकि दोनों ही योजनाओं में जिम्मेदारों ने खूब अवैध कमाई की। जिम्मेदारों ने ले-देकर ऐसे लोगों को आवास योजनाओं का लाभार्थी बना दिया जो पूरी तरह से अपात्र थे। इसकी सुगबुगाहट मिलने पर पूर्व में सीडीओ ने दोनों योजनाओं की जांच कराई तो भारी संख्या में अपात्र मिले। इसमें शहरी योजना में लगभग 3445 और ग्रामीण में 415 लाभार्थी ऐसे सामने आए जिन्होंने अपात्र होने के बाद भी जिम्मेदारों की हथेली गर्म करके आवास योजना का लाभ ले लिया।
प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना
कुल लक्ष्य-27104
धनराशि-कुल 3.88 लाख की योजना में 2.50 लाख का सरकार दे रही अनुदान
अपात्र मिले-3445
वसूली-30 से 50 हजार रुपये तक
प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना
कुल लक्ष्य-2017-18 में 12145, 2018-19 में 5993 और 2019-20 में 1531
धनराशि-तीन किस्तों में 1.20 लाख, शौचालय के लिए 12 हजार और 90 दिन की मनरेगा मजदूरी अतिरिक्त।
अपात्र मिले-415
वसूली-20 से 30 हजार
प्रधानमंत्री शहरी और ग्रामीण आवास योजना में जो अपात्र पाए गए हैं उनसे रिकवरी कराई जा रही है। ग्रामीण योजना में अब तक 273 अपात्रों से रिकवरी कराई जा चुकी है। शेष 132 अपात्रों से धनराशि रिकवरी कराई जा रही है। शहरी आवास योजना में कई सर्वेयर को हटाया जा चुका है। डूडा विभाग की एक संविदा महिला कर्मचारी का जिले से ट्रांसफर हो चुका है। अन्य जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई की जा रही है।
-डॉ. राजेश कुमार प्रजापति, मुख्य विकास अधिकारी।