उन्नाव। ओलावृष्टि और बारिश से बर्बाद हो चुकी फसलें देखकर किसानों की सांसें अटकी हुई हैं। उनकी पीड़ा का कोई अंत नहीं है। जिस फसल को घर ले जाने की तैयारी किसान कर रहे थे, उस पर मौसम की ऐसी मार पड़ी कि सबकुछ तबाह हो गया। आम के बागवानों को भी काफी नुकसान पहुंचा। अब प्रभावित किसानों के सामने मजदूरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
मौरावां की ग्राम पंचायत हिलौली के मजरे रावतखेड़ा की आबादी करीब 200 है। यहां 140 हेक्टेयर में गेंहू और 15 हेक्टेयर में सरसों बाेई गई थी। ओलावृष्टि से गेहूं, सरसों में भारी तबाही हुई। किसानों की साल भर की उम्मीदें धराशायी हो गईं। किसी ने बैंक से ऋण लेकर फसल बोई थी तो किसी ने परिचितों से पैसा लिया था। फसल नष्ट होने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार का भरणपोषण और उधार व लिए गए ऋण को वापस करना है। यहां से फसल बीमा के लिए महज 10 किसानों ने दावा पेश किया है।
रावतखेड़ा के किसान हरीशंकर ने बताया कि पांच बीघा गेहूं की फसल ओलावृष्टि में नष्ट हो गई है। 12 लोगों के परिवार के सामने खाद्यान्न का संकट खड़ा हो गया है। 25 हजार रुपये की लागत लगा चुका हूं। खाद बीज के रुपये दुकानदार से उधार लिए थे। आर्यावर्त बैंक से लिया गया कर्ज भी चुकाना था। सोचा था कि उपज की बिक्री करके सब चुकता कर देंगे, लेकिन स्थितियां ज्यादा खराब हो गई हैं।
किसान पुत्तीलाल ने बताया कि तीन बीघा गेहूं की फसल नष्ट हो गई। पांच बीघे जमीन ठेके पर ले रखी थी, उसमें 20 क्विंटल गेहूं खेत मालिक को देना होगा। अब देखो कैसे नैया पार लगती है। कुल आठ बीघे जमीन में 40 हजार रुपये की लागत आई थी। अब तो दोहरे कर्ज का दंश झेलने की मुसीबत बन चुकी है।
किसान राजू ने बताया कि ओलावृष्टि से कुल छह बीघा गेहूं की फसल नष्ट हो गई है। कुल 30 हजार रुपये की लागत लगी थी। घर में छोटे बड़े 16 लोग परिवार में हैं। परिवार के लिए राशन बाजार से खरीदना महंगा पड़ेगा। ऐसे में शहर जाकर मजदूरी करके परिवार को पालना पड़ेगा।
हसनगंज में ओलावृष्टि से प्रभावित गांव शाहपुर तोंदा के किसान भी परेशान हैं। 400 आबादी वाले इस गांव में 152 हेक्टेयर में गेहूं, 8 हेक्टेयर में सरसों बोई थी। जबकि 15 हेक्टेयर में आम के बाग थे। ओले गिरने से गेहूं-सरसों को तो नुकसान पहुंचा ही है। आम के पेड़ों में लगा बौर भी गिर गया है। ऐसे में बागवान भी परेशान हैं। अब बागवानों के सामने परिवार का भरणपोषण करने का संकट खड़ा हो गया है। अधिकांश लोग आम के सहारे ही साल भर का खर्चा निकालते हैं। बागवानों का कहना है कि 35 फीसदी बौर गिर गया है। वहीं किसानों का कहना है कि गेहूं से ही साल भर का खर्चा चलता है। फसल नष्ट हो गई है।
शाहपुर तोंदा निवासी किसान गुरचरण सिंह ने बताया कि दस बीघा में आम के बाग हैं। मार्च माह के पहले सप्ताह तक 99 हजार रुपये पेड़ की धुलाई, गुड़ाई व दवाई में खर्च हो चुके थे। ओलावृष्टि से बौर झड़ गया है, जिसमें लाखों रुपये का नुकसान हुआ है। परिवार चलाने का एकमात्र बागवानी ही सहारा था।
गांव के विनीत ने बताया कि चार बीघा बागवानी है। इस बार हर पेड़ बौर से लदा हुआ था। अच्छे उत्पादन की उम्मीद थी,लेकिन ओलावृष्टि से 50 फीसदी ही पौधों पर बौर बचा है। शेष जमीन पर गिर गया है। इसकी भरपाई होना संभव नहीं है।
गांव के राहुल यादव ने बताया कि गेहूं की एक बीघा फसल बोई थी। बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि से गेहूं की फसल खेत में ही गिर गई। इससे तगड़ा नुकसान हुआ है। अब भरपाई कहां से करें, यह समझ में नहीं आ रहा है। परिवार के गुजारे का संकट चुनौती बनकर सामने है। बच्चों की जरूरतें कैसे पूरी करेंगे।