फोटो-9-शोपीस बना चिंगरपुरवा में लगा प्लांट। संवाद
गंजमुरादाबाद। लगातार बढ़ते तापमान के कारण पिपरमिंट की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है। अधिक सिंचाई की आवश्यकता से लागत बढ़ गई है, जिससे किसान इस फसल से दूर हो रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में लगे पिपरमिंट पेराई के प्लांट अब शोपीस बनकर रह गए हैं।
करीब एक दशक पहले कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पिपरमिंट की खेती होती थी। इसके चलते कई गांवों में पिपरमिंट पेराई के प्लांट भी लगाए गए थे। मार्च में लगाई जाने वाली पिपरमिंट की पौध मई और जून में तैयार होती है। इस खेती में सिंचाई सबसे महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नमी से अधिक तेल निकलता है। वर्तमान में अधिक तापमान के कारण फसल में करीब 15 बार पानी लगाना पड़ रहा है। इससे एक बीघा फसल तैयार करने में करीब 20 हजार रुपये की लागत आ रही है। कानपुर और बांगरमऊ मंडी में पिपरमिंट का तेल एक हजार रुपये प्रति लीटर बिकता है। एक बीघा भूमि की फसल से करीब 12 से 15 लीटर तक तेल निकलता है। इस गणित के अनुसार, यह फसल किसानों के लिए लाभकारी नहीं रह गई है।
चिंगरपुरवा के किसान किशनपाल, जगरूप, बबलू और सुरेश ने अपनी परेशानी बताई। उन्होंने कहा कि अधिक तापमान के कारण पिपरमिंट की फसल में सिंचाई बहुत करनी पड़ती है। लागत भी नहीं निकल पाती, जिससे यह फसल घाटे का सौदा बन गई है। ग्रामीण इलाकों में एक लाख रुपये खर्च कर लगाए गए पिपरमिंट पेराई के प्लांट अब बेकार पड़े हैं।
राजकीय कृषि बीज भंडार के प्रभारी मुकेश सिंह ने बताया कि पिपरमिंट की खेती में लागत लगातार बढ़ रही है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे पिपरमिंट के स्थान पर अन्य फसलों की खेती पर विचार करें। यह किसानों के लिए अधिक फायदेमंद हो सकता है।