उन्नाव। दिनों में अफजल माने जाने वाले जुमा के दिन इस बार माह-ए-रमजान की शुरुआत हुई है। पहले रोजे पर शुक्रवार को मस्जिदों में रोजदारों ने नमाज अदा की। नमाज-ए-जुमा से पहले मस्जिदों में तकरीर कर रोजे की अहमियत को बताया गया।
उलेमाओं ने माहे रमजान-उल-मुबारक की फजीलत बयान की। उन्होंने बताया कि उम्मते रसूल पर रोजे नबी की हिजरत से एक साल बाद फर्ज किए गए। खुदा ने अपने बंदों में सब्र की ताकत बढ़ाने के लिए रोजे फर्ज किए ताकि खुद भूखे-प्यासे रहकर दूसरों की भूख प्यास महसूस कर सकें।
इससे दूसरों की मदद करने का जज्बा पैदा होगा। जानकार बताते हैं कि रोजा के मायने रुक जाना से है। हर वो चीज जो हम साल के दूसरे महीनों में खाते-पीते हैं, उनसे दिन भर के लिए परहेज करना। सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम रोजा नहीं है बल्कि आंख, कान, जुबान, हाथ-पैर सभी का रोजा होता है।
आंख का रोजा यह है कि हम तमाम बुरी चीजों को न देखकर कुरान शरीफ को देखें। कान से गाली-गलौज, गीबत न सुनें सिर्फ अल्लाह और उसके रसूल की तारीफ सुनें। अपनी जुबान से किसी की बुराई न करें। किसी को तकलीफ देने वाली बातों से बचें और खुदा का ही जिक्र करें। नमाज पढ़ें व कुरान की तिलावत करें। हाथ सिर्फ अच्छे कामों के लिए उठाएं। बुराई की तरफ जाने से अपने पैरों को रोक लें।