उन्नाव। महाराष्ट्र राज्य के ठाणे में शहीद राव रामबख्श सिंह चौक के निर्माण में एक और अड़चन दूर हो गई है। अशोक नगर प्रवेशद्वार पर बनने वाले इस चौक के लिए भिवंडी ट्रैफिक पुलिस ने अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी कर दिया है। इससे जल्द चौक निर्माण होने की संभावना बढ़ गई है। चौक की डिजाइन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
डौंडियाखेड़ा के राव रामबख्श सिंह को महाराष्ट्र में बड़ा सम्मान मिला है। यहां के जिला ठाणे में भिवंडी महानगर पालिका शहीद राव रामबख्श सिंह के नाम पर चौक निर्माण कराने जा रही है।
4 अगस्त 12 को भिवंडी महानगर पालिका महासभा के सदस्य विकास एस निकम ने अमर शहीद राव रामबख्श सिंह चौक निर्माण का प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किया था। एक अन्य सदस्य देहरकर महेंद्र सदाशिव ने इसका अनुमोदन किया। प्रस्ताव पर राजा साहब का इतिहास जानने के लिए महापौर व पीठासीन अधिकारी प्रतिभा विलास पाटिल ने एक समिति गठित की।
समिति ने राव राम बख्श के इतिहास की गहन जानकारी हासिल की। पूरी रिपोर्ट सदन को सौंपी। अंग्रेजों के लिए आतंक बने रहे राजा साहब की पूरी जानकारी होने पर सदन ने उनकी शहादत का लोहा माना और 11 फरवरी 13 को महापौर प्रतिभा विलास पाटिल ने राजा राव रामबख्श सिंह के नाम पर क्षेत्र के अशोक नगर प्रवेशद्वार पर चौक निर्माण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।
इसके लिए 15 से 17 लाख रुपये खर्च होंगे। 10 नवंबर 14 को भिवंडी ट्रैफिक पुलिस ने एनओसी जारी करते हुए महानगर पालिका के शहर अभियंता को पत्र भेज दिया। इसके बाद अब चौक निर्माण की दिशा में एक कदम और बढ़ गया है।
कैसे मुंबई पहुंचे राव साहब
बीघापुर तहसील के बारा निवासी विनोद चंद्रनाथ त्रिपाठी करीब 20 साल पहले मुंबई के ठाणे में जाकर बस गए थे। विनोद वहां पर ठेकेदारी करते हैं।
बकौल विनोद, उनके पूर्वज पं. भलभद्रराम राव साहब के रियासत में जमींदार थे। साथ ही उनके करीबी सहयोगी थे। राव साहब के साथ उनके पूर्वजों ने भी देशहित के लिए कुर्बानी दी थी। विनोद ने ही राव साहब के लिए चौक बनाने का प्रयास शुरू किया था।
आज राजा साहब को दी गई थी फांसी
28 दिसंबर 1859 को राव राम बक्स सिंह को बक्सर में फांसी दी गई थी। आठ अंग्रेजों को जला कर मार डालने वाले राव साहब की कोई भी निशानी अंग्रेज छोड़ना नहीं चाहते थे।
यही कारण था कि अंग्रेजों ने फांसी देने के बाद डौंडियाखेड़ा स्थित राव साहब के किले को गिरवाना शुरू कर दिया था। मजदूर जब किले की दीवार नहीं गिरा पाए तो अंग्रेजों ने तोप के गोले दागकर दीवार को गिरा दिया। इसके बाद से ही डौंडियाखेड़ा वीरान हो गया। समय के साथ यहां बबूल के पेड़ों के जंगल उग आए।
काफी समय तक बाबू जी के शिवाला (यहां राव राम बक्स सिंह भगवान शंकर की पूजा करते थे) में भी पूजा-अर्चना ठप रही। पिछले साल संत शोभन सरकार द्वारा किले में हजारों टन सोना होने की घोषणा के बाद एकाएक डौंडियाखेड़ा देश विदेश में प्रसिद्ध हो गया है।