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Unnao News: सड़क हादसे का शिकार महिला के सिपाही होने की नहीं पुष्टि

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महिला के बारे में दही एसओ को जानकारी देते पूर्व प्रधान।  - फोटो : महिला के बारे में दही एसओ को जानकारी देते पूर्व प्रधान।
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सोनिक (उन्नाव)। कानपुर-लखनऊ हाईवे पर वाहन की टक्कर से स्कूटी सवार महिला की मौत के मामले में उसके सिपाही होने की पुष्टि नहीं हो पाई है। वर्दी में लगी नेम प्लेट पर पीएनओ नंबर नहीं मिला है। तैनाती स्थल जानने के लिए पुलिस ने कंट्रोलरूम से लेकर लखनऊ के कई थानों में फोन किया लेकिन पता नहीं चला। खास बात यह कि मायके पक्ष के लोग तो दूर पति भी कुछ नहीं बता सका। गुजरात में रह रहे पति ने खुद के आने के बाद ही पोस्टमार्टम कराने की बात कही है।
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मऊ जिले के थाना रानीपुर के गांव मंडूसरा निवासी स्कूटी सवार शिल्पी (30) पत्नी अश्वनी सिंह की शुक्रवार रात हाईवे पर निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेसवे के पास वाहन की टक्कर से मौत हो गई थी। स्कूटी पर पुलिस लिखा होने और वर्दी पहने होने से सभी ने सिपाही माना। दही एसओ ने पहचान का प्रयास किया लेकिन तैनाती का पता नहीं चल सका। महिला के पास मिले आधार कार्ड से लखनऊ के मानसनगर भोलाखेड़ा का पता मिला, वहां किराये के घर में रहती थी। पुलिस को मऊ जिले में ससुराल होने की भी जानकारी मिली।
पुलिस अधिकारी भी तैनाती का पता लगाते रहे, लेकिन जानकारी नहीं मिली। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वह पुलिस में थी ही नहीं, वर्दी पहनकर सिर्फ रौब गांठती थी। पति के आने के बाद पुलिस आगे की कार्रवाई की बात कह रही है। देर शाम मृतका के मायके बलिया जिले के थाना पालकी के हुसैनाबाद सिकंदरापुर निवासी पूर्व ग्राम प्रधान महेश सिंह पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। बताया कि शिल्पी अपने मायके वालों से भी बात नहीं करती थी। इसलिए अधिक पता किसी को नहीं है। मृतका के पिता और भाई भी अलग-अलग शहरों में काम करते हैं, सभी रास्ते में हैं।
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दही थानाध्यक्ष संजीव कुशवाहा ने बताया कि परिवार का कोई भी नहीं आया है। पति और भाई रविवार को पहुंचेंगे, तभी पोस्टमार्टम कराया जाएगा। अभी तक की जांच में कहीं भी उसकी तैनाती का पता नहीं चला है। एसपी दीपक भूकर ने बताया कि महिला के सिपाही होने की पुष्टि नहीं हुई है। दोबारा जांच के लिए एसओ दही को आदेश दिए गए हैं।
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पति का आरोप- हादसा नहीं कराई गई हत्या, एक सिपाही पर आरोप
सोनिक। मृतका के पति अश्वनी सिंह ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि उसकी पत्नी शिल्पी की मौत नहीं बल्कि हत्या कराई गई है। हत्या में पूर्व में लखनऊ में तैनात रहे एक सिपाही के शामिल होने का आरोप लगाया है।
बताया कि वर्ष 2012 में शादी होने के बाद साल 2016-17 में लखनऊ आए। पत्नी के साथ लखनऊ के भोलाखेड़ा में किराये के घर में रहने लगा। वह अपोलो अस्पताल में सिक्योरिटी गार्ड था। पत्नी भी एक कंपनी के माध्यम से सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करती थी। इसी बीच पत्नी का परिचय एक सिपाही से हो गया। सिपाही के करीब आते ही पत्नी ने उससे दूरी बना ली। यहां तक कि सिपाही उसे जान से मारने की धमकी तक देने लगा। पत्नी भी उसी का साथ देती और दूसरी शादी करने की बात कहने लगी। मौजूदा समय में सिपाही की तैनाती बलरामपुर बताई जा रही है।
अश्वनी के मुताबिक, शिल्पी की हरकतों से तंग होकर 22 नवंबर 2021 को वह लखनऊ छोड़कर चला गया और मौजूदा समय में गुजरात की एक रिफाइनरी में काम कर रहा है। गुजरात जाने पर पता चला कि फेसबुक पर पत्नी ने वर्दी पहनकर फोटो डालना शुरू कर दिया है। यही नहीं वह भोलाखेड़ा छोड़कर पंडितखेड़ा मोहल्ले में किराये पर 12 साल के बच्चे हर्ष के साथ रहने लगी। पति के मुताबिक, एक महिला सिपाही भी फेसबुक आईडी में पत्नी से जुड़ी हुई थी। उसने उस सिपाही की आईडी पर रिक्वेस्ट भेजकर पत्नी और पुरुष सिपाही की जानकारी ली तो पता चला दोनों में विवाद हुआ और उसने बलरामपुर पोस्टिंग करा ली। स्थित यह थी कि पत्नी न तो ससुराल और न ही मायके में किसी से बात करती थी। मायके वालों को भी नहीं पता था कि यह वर्दी उसे कैसे और किसने दी। पति ने सिपाही पर रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही है।
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ददिया सास की तेरहवीं और ससुर के गंभीर घायल होने पर भी नहीं गई
पूर्व प्रधान महेश सिंह ने बताया कि मृतका शिल्पी की ददिया सास की 15 जनवरी को तेरहवीं थी। उसमें भी वह शामिल नहीं थी। इससे पहले ससुर संजय सिंह का गंभीर एक्सीडेंट हुआ था। इसकी सूचना भी इसे दी गई थी, लेकिन वह नहीं आई। इस कदर दूरियां होने से परिवार के लोग भी अधिक ताल्लुक नहीं रखते थे। उन्होंने बताया कि महिला के छत्तीसगढ़ राज्य के जिला दुर्ग का पता पड़ा है, वहां उसके ससुर प्राइवेट नौकरी करते हैं। मौत के बाद बच्चे के मृतका की बुआ सास के पास रखा गया है।
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रुपये के लेनदेन में गई थी जेल, बेल पर आई थी बाहर
मृतका के भाई आशीष सिंह ने फोन पर बताया कि साल 2019 में रुपये लेनदेन में शिल्पी को जेल भी हुई थी, उसने नौकरी दिलाने के नाम पर रुपये लिए थे। चार महीने बाद उसे बेल मिली थी। वह हम लोगों को कुछ अधिक न बताती थी। जब भी कुछ पूछो बस यही कहती थी कि पुलिस की नौकरी मिल गई है। वह अन्य पुलिस कर्मियों के साथ अपनी फोटो भी भेजा करती थी। यही नहीं लखनऊ के 1090 चौराहे पर ड्यूटी करने की कई बार फोटो भी खींचकर भेजी थी। मृतका तीन भाई दो बहनों में सबसे बड़ी थी, मां मंजू हैं।
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