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इस गांव की माटी में है देश सेवा, फौज में जाना सबकी पहली पसंद, 70 बेटे सेना में

Thu, 15 Aug 2019 03:31 AM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, उन्नाव
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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर बीघापुर के पनईबुजर्ग गांव में भंवरेश्वर महादेव मंदिर में बैठक करते पूर्व सैनिक - फोटो : अमर उजाला
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देश की आन-बान और शान के लिए प्राणों की आहुति देने तक का जज्बा देखना हो तो उन्नाव के बीघापुर तहसील (बैसवारा) के पनई बुजुर्ग गांव जाइए। महज तीन हजार आबादी वाले इस गांव ने देश की आजादी के लिए स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई से लेकर आजादी के बाद पड़ोसी मुल्कों से हुईं जंगों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

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देश की रक्षा की दीवानगी की लौ कभी मंद नहीं हुई। गांव के 70 बेटे इस समय देश की सरहदों की रक्षा कर रहे हैं। जबकि गांव में रहने वाले 60 सेवानिवृत सैनिक नई पीढ़ी को देश सेवा के लिए तैयार कर रहे हैं। पूर्व सैनिकों के बेटों ने भी राष्ट्र सेवा की जिम्मेदारी अपने कांधों पर ली है।

कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनके सभी बेटे देश की सेवा कर रहे हैं। देश सेवा, पराक्रम, वीरता और शौर्य इस गांव की फिजा में ऐसा घुला है कि सेना में भर्ती होना ही गांव के हर युवा की पहली प्राथमिकता होती है।

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- विद्याशंकर तिवारी का बेटा दुर्गेश तिवारी थलसेना में हवलदार हैं। वर्ष 2000 से वह देश की सेवा कर रहे हैं। पिता ने कहा कि अगर उनके और बेटे होते तो वह उन्हें भी फौज में ही भेजते।

- शंभू सिंह का बेटा राधवेंद्र सिंह भी थलसेना में हवलदार के पद पर तैनात है। शंभू सिंह ने बताया कि उन्हें खुशी है कि उनका बेटा देश की सेवा कर रहा है। कहते हैं कि अपने पोते    को भी फौजी बनाएंगे।

- शिवकली देवी के पति गुरुप्रसाद सिंह सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। इन्होंने अपने दो बेटों को देश की सेवा के लिए फौज में भेजा है। बेटे सत्येंद्र सिंह और अमरेंद्र सिंह थलसेना में हवलदार हैं। पौत्र विश्वदीप भी तैयारी कर रहा है।

- माधुरी देवी के पति ओमप्रकाश सिंह वायुसेना में सार्जेंट पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बेटा नीरज सिंह और दीपक सिंह थलसेना में रहकर राष्ट्र सेवा कर रहे हैं। माधुरी कहती हैं कि वह अपने पौत्र अथर्व और शौर्य को भी फौजी बनाएंगी।

- सेवानिवृत्त नायक इंद्रपाल सिंह ने बताया कि अपने सेवाकाल में दुश्मन सेना से सीधे-सीधे मोर्चा नहीं हुआ। वह कहते हैं कि अगर मौका मिले तो वह पीछे नहीं हटेंगे।

- भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त ओमप्रकाश सिंह के दो बेटे दीपक और नीरज थल सेना में हैं। वह कहते हैं कि मौका मिले तो वह एक बार फिर देश की सेवा को तैयार हैं।

- सेवानिवृत्त कैप्टन योगेंद्र बहादुर सिंह का इकलौता बेटा नितिन सिंह भी सेना में हैं। योगेंद्र कहते हैं कि देश की सेवा का मौका बड़ी किस्मत से मिलता है।

- सेवानिवृत्त नायक कृष्ण शरण सिंह भी कुछ ऐसा ही चाहते हैं। वह बताते हैं कि राष्ट्र सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं। बताते हैं कि मौका मिले तो कदम पीछे नहीं खींचेंगे।

सेना में सेवारत पनई बुजुर्ग के बेटे
नितिन सिंह, सुखदेव सिंह, अमित कुमार सिंह, प्रेम प्रकाश सिंह, यशवंत सिंह, कुलवंत सिंह, दिनेश कुमार दुबे, अजय कुमार सिंह, सत्येंद्र सिंह, संदीप सिंह, शैलेंद्र सिंह, बलवीर सिंह, सुनील सिंह, सुशील सिंह, अनिल सिंह, अमरेंद्र सिंह, सत्येंद्र सिंह, दीप शरण सिंह, मेजर आदित्य प्रताप सिंह, राघवेंद्र सिंह, दुर्गेशचंद्र तिवारी, नीरज सिंह, दीपक सिंह, रमेश कुमार त्रिवेदी, सुरेश कुमार द्विवेदी, महेश कुमार द्विवेदी, ऋषि रतन सिंह, हिमांशु रतन सिंह, नरेंद्र बहादुर सिंह, दिनेश बहादुर, प्रदीप कुमार, वीरेंद्र पाल, आनंदपाल सहित 70 लोग।

सेवा निवृत्त सैनिक
कैप्टन योगेंद्र बहादुर सिंह, अमर सिंह, भीम शंकर त्रिपाठी, अकबाल शंकर त्रिपाठी, सुनील कुमार दुबे, कैप्टन ध्यान सिंह, मानसिंह, उपेंद्र सिंह, अखिलेश शुक्ला, देवेंद्र प्रताप सिंह, रविंद्र प्रताप सिंह, शिव प्रकाश सिंह, ओम प्रकाश सिंह, शिव प्रकाश सिंह राजू, शिव प्रकाश सिंह मनोज, कृष्ण शरण सिंह, महेंद्र सिंह, अवनींद्र सिंह, धर्मपाल सिंह, प्रेम शंकर तिवारी, रवी शंकर तिवारी, रविंद्र प्रताप सिंह, रघुवीर सिंह राठौर, महेंद्र प्रताप भी शामिल हैं।

पूर्व सैनिक बोले खुशकिस्मती से मिला देश सेवा का मौका
देश की सेवा और सरहदों की रक्षा करते हुए दुश्मन सेना को धूल चटाने वाले जिले पूर्व सैनिकों की रगों में भले ही अब वह ताकत और जोश न हो, लेकिन देश भक्ति और सेवा का जज्बा आज भी हिलोरे मार रहा है। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के केंद्र सरकार के फैसले का पूर्व सैनिकों में ऐसी खुशी है कि मानों कोई बड़ी जंग जीत ली हो। पूर्व सैनिकों ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि किसी दुश्मन देश से लड़ाई तो कुछ महीने की होती है, लेकिन आतंकवाद से सेना को लड़ते 70 साल हो गए। मोदी सरकार का यह कदम आतंकवाद के खिलाफ अनवरत चल रहे युद्ध पर विजय कहा जाए तो गलत न होगा।

चीन और पाक से हुए युद्ध में मिला मौका
बीघापुर के कल्याणपुर द्वितीय गांव निवासी कैप्टन संकठा प्रसाद सिंह ने बताया कि वह सेना की मेडिकल कोर में रहे। बताते हैं सौभाग्य की बात है कि उन्हें 1962 में चाइना और 1971 में बांगलादेश से हुए युद्ध में देश की सेवा करने का मौका मिला। बताया कि 1971 में कश्मीर के शंकरगढ सेक्टर में गार्ड रेजीमेंट पर पाक सेना ने घेरकर गोलियां दागी थीं। गोलीबारी के बीच से होते हुए घायल जवानों का  इलाज किया और जान बचाई।
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बेटा होता तो उसे भी फौजी बनाते
सफीपुर तहसील के पीखी गांव निवासी गंगा प्रसाद रावत नागालैंड में तैनात रहे। हेड क्वार्टर जुखाबा में इंजीनियर रेजीेमेंट में तैनाती के दौरान नवंबर 1971 में युद्ध के दौरान उनकी पूरी रेजीमेंट को कश्मीर भेजा गया। लगातार युद्ध के दौरान देश की सेवा करने का मौका मिला। वह बताते हैं कि बर्फीली पहाड़ियों के बीच महीनों बिताए, लेकिन दुश्मनों को हावी नहीं होने दिया। बोले, चार बेटियां हैं। बेटा होता तो उसे भी सेना में भेजते।

दिनरात जागकर किया घायल सैनिकों का इलाज
नवाबगंज ब्लॉक के बिचपरी गांव निवासी सूबेदार मेजर राजेश मिश्रा ने बताया कि कारगिल युद्ध के समय वह चिकित्सा कोर में थे। लगातार 14 घंटे ड्यूटी करके युद्ध में घायल हो रहे मरीजों का इलाज किया। टीम में 150 लोग थे। सरकार ने सैनिकों को जल्द से जल्द इलाज दिलाने के लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की थी। इससे तमाम सैनिकों की जान बचाई जा सकी थी।

रात के अंधेरे में पहुंचाते थे गोलाबारूद और रसद
शहर के मोहल्ला इंदिरानगर निवासी सूबेदार नंदकिशोर पटेल बताते हैं कि कारगिल युद्ध करीब 25 दिनों तक चला। वह सप्लाई कोर में थे और सैनिकों तक गोला-बारूद, रसद के अलावा सैनिकों को भी मोर्चों तक पहुंचाने का काम करते थे। उनकी कोर जम्मू में राजा हरि सिंह पैलेस के पास ही थी। नंदकिशोर बताते हैं कि युद्ध के दौरान पूरा परिवार बेहाल रहा। उस समय फोन या मोबाइल की सुविधा नहीं थी। घर परिवार और अपनी कुशलता का हालचाल जानने और बताने के लिए सिर्फ चिट्ठी ही एक जरिया थी। 

गर्व है देश के लिए लड़ा: अमरनाथ यादव
पुरवा तहसील के पूरनदास खेडा अमरनाथ यादव कारगिल युद्ध के समय सिपाही थे। झांसी के पास तालवेट से पूरी बटालियन के साथ ट्रेन से गए थे। पूरी बटालियन एक पहाड़ी पर लगाई गई थी। बोफोर्स तोप से लगातार 48 घंटे तक फायरिंग की थी। इस दौरान पूरा परिवार चिंतित रहा। छुट्टी पर घर आया तो पूरा परिवार ऐसे चिपटा मानो मौत के मुंह से निकल कर आया था। वह कहते हैं कि गर्व है कि उन्होंने देश के लिए कारगिल जैसा युद्ध लड़ा और दुश्मनों के छक्के छुड़ाए।
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