उन्नाव। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक में मकानों और दुकानों की छतों पर लगे मोबाइल टॉवर यमदूत से कम नहीं हैं। रिहायशी इलाकों में लगे करीब दो सैकड़ा से अधिक टॉवर लगाने में नियमों की अनदेखी की गई है। यूडीए से इमारत की तकनीकी जांच कराए बगैर ही छतों पर लगाए गए टॉवर कभी भी बड़े हादसों की वजह बन सकते हैं।
भवन स्वामी हर महीने कमाई कर रहे हैं और आसपास के लोग रेडिएशन और वायु प्रदूषण झेल रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि अधिकांश मोबाइल कंपनियों ने टॉवर लगाने से पहले यूडीए, पीडब्ल्यूडी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी लेना भी मुनासिब नहीं समझा। घनी आबादी के बीच अलग-अलग कंपनियों के 250 से अधिक मोबाइल टॉवर हैं। इनसे निकलने वाला रेडिएशन आसपास के लोगों में तरह-तरह की बीमारियां दे रहा है। इनमें लगे जेनरेटरों से हो रहा वायु प्रदूषण भी मुसीबत बना है।
कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
मोबाइल टॉवर कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। वजह यह है कि जिन इमारतों की छतों पर यह टॉवर लगे हैं उनमें से अधिकांश इनका बोझ सहने के काबिल नहीं हैं। तेज हवा या आंधी में टॉवर कभी भी जमीन पर आ सकते हैं। शहर में देखा जाए तो यहां के मोहल्ला पीतांबर नगर, आवास विकास कॉलोनी, मोतीनगर, आदर्श नगर, सिविल लाइन, कल्याणी देवी, प्रियदर्शिनी नगर में खतरे वाले टॉवर लगे हैं।
अधिकारी बोले
यूएसडीए के सचिव पीके सिंह ने बताया कि मोबाइल टावर की अनुमति आवश्यक है। शहर में किसी भी टॉवर की यूएसडीए से अनुमति नहीं ली गई है। शिकायत पर दस लोगों को नोटिस देकर जवाब मांगा गया है। और भी भवन स्वामियों को नोटिस दिए जाएंगे। उन्होंने बताया कि हाल ही में ऑनलाइन पोर्टल शुरू हुआ है। जिला स्तर पर एक अधिकारी नामित होगा। आवेदन पर संबंधित विभाग (नगर पालिका, प्राधिकरण या ब्लॉक) अनापत्ति प्रमाणपत्र देगा। जिला स्तर पर एडीएम नोडल अधिकारी हैं। पोर्टल के माध्यम से अभी तक सिर्फ एक आवेदन आया है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी विमल कुमार ने बताया कि मोबाइल टॉवर में अगर पांच केवीए क्षमता से अधिक का जेनरेटर लगाना है तो एनओसी लेना आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि जनरेटर में कैनोपी लगी हो, तकि तेज आवाज और धुआं न फेंके। विभाग से कुछ ही मोबाइल टॉवरों के लिए अनुमति ली गई है।
स्वास्थ्य पर भी पड़ता है असर
आशा खेड़ा स्थित श्री राम मूर्ति मेडिकल कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि मोबाइल टॉवर से निकलने वाले रेडिएशन से कैंसर का खतरा रहता है। हालांकि इसका असर लंबे समय बाद नजर आता है। बताया कि रेडिएशन के कारण दिमाग और कान के सेल्स ठीक से रिपेयर नहीं होते हैं। अगर होते भी हैं तो सही तरीके से रिपेयर नहीं होता और आगे चलकर कैंसर का कारण भी बन सकता है। बताया कि टॉवर से 100 मीटर दायरे में रेडिएशन सबसे ज्यादा प्रभावी होता है। अगर जनरेटर से धुआं अधिक निकल रहा है तो वह व्यक्ति के फेफड़ों पर असर डालता है और श्वास व फेफड़ों से संबंधित रोग भी हो सकते हैं।
यह हैं मानक
-मोबाइल टॉवर घनी आबादी में नहीं होना चाहिए।
-सरकारी जमीन का उपयोग नहीं होना चाहिए।
-जिस इमारत में टॉवर लगे, नक्शा पास होना जरूरी।
-इमारत के व्यवसायिक उपयोग की अनुमति आवश्यक।
-यूडीए से तकनीकी जांच और अनुमति आवश्यक है।
-मोबाइल टॉवर विद्युत लाइनों के नजदीक नहीं लगा हो।
-हाईटेंशन लाइन इतनी दूरी हो कि टॉवर उसपर न गिरे।
-प्रदूषण बोर्ड से जेनरेटर में ध्वनि, वायु प्रदूषण नहीं है, इसकी एनओसी जरूरी।