उन्नाव। फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होली मनाई जाती है। होली के त्योहार के आठ दिन पूर्व होलाष्टक लग जाता है। इस बार 26 फरवरी से होलाष्टक लग रहा है।
इसे देखते हुए शहर के मुख्य चौराहों पर होलिका लगने लगी है। शहर के लगभग एक सौ से अधिक स्थानों पर होलिका जलाई जाती है जिसके लिए लोगों ने तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
जिस स्थान को होलिका जलाने के लिए चुना जाता है पहले उस जगह को शुद्ध कर लिया जाना चाहिए। यह काम होलाष्टक के दिन से शुरू किया जाता है। इस बार होलिका दहन पांच मार्च को पड़ रही पूर्णिमा को होगा। छह मार्च को परेवा होने के कारण रंग खेला जाएगा।
होलिका दहन के तीसरे दिन दूज मनाई जाएगी। दूज इस बार सात मार्च को पड़ रही है। मान्यता है कि होलाष्टक लगने के 8 दिन बाद पूर्णिमा के दिन होलिका जलाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन होलिका में नया अनाज अग्नि को समर्पित करने से पैदावार अच्छी होती है।
होलिका दहन में क्या बरतें सावधानियां
उन्नाव। होलिका दहन में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। जिसमें मुख्य है कि होलिका लगाने में हरी लकड़ियों का प्रयोग न करें। टायर, ट्यूब, कबाड़, कूड़ा, प्लास्टिक, रबर की चीजें व जूते आदि होलिका में न डालें। इस प्रकार की वस्तुओं का इस्तेमाल करने से वातावरण तो दूषित होता ही है साथ ही पूजन आदि कार्यों में यह चीजें बाधित भी होती हैं।
जानें कैसे हुई होलाष्टक की शुरुआत
उन्नाव। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि अन्न की पैदावार होने के बाद उसका भोग भगवान को लगाना चाहिए। इसलिए इस दिन गेहूं की बालियों को गन्ने में बांधकर अग्नि को समर्पित किया जाता है। इसके अलावा एक कहावत है कि भक्तराज प्रहलाद की बुआ होलिका ने उसे अपने साथ अगिभन में बैठा लिया था।
होलिका को अगिभन में न जलने का वरदान मिला हुआ था लेकिन जब प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई तो इससे प्रसन्न होकर लोगाें ने इस दिन को होलिका दहन के रूप में मनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके अलावा एक प्राचीन मान्यता यह भी है कि भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ लगातार आठ दिनों तक रंग खेला था और नवें दिन अपने वस्त्र अगिभन को समर्पित कर दिए थे तभी से होली का त्योहार मनाया जाता है।