-शिवमंगल सिंह सुमन ने हिंदी साहित्य को किया समृद्ध, आज मनाई जाएगी उनकी पुण्यतिथि
संवाद न्यूज एजेंसी
बीघापुर। यहां हार एक विराम है ,जीवन चिर संग्राम है ,क्या हार में क्या जीत में ,संघर्ष पथ में जो मिले यह भी सही वह भी सही, अमर पंक्तियां लिखने वाले डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन का जन्म क्षेत्र के झगरपुर में पांच अगस्त को 1915 को हुआ था। सुमन जी ने आमजन की पीड़ा को अपने साहित्य में पिरोकर कालजयी रचनाएं लिखीं।
साहित्य उर्वरा भूमि में जन्मे कवि डॉ.शिवमंगल सिंह सुमन की पुण्यतिथि उनकी जन्मस्थली झगरपुर में सोमवार को मनाई जाएगी। उनकी प्रतिमा पर साहित्यकार और समाजसेवी श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। सुमन जी ने हिंदी साहित्य को समृद्ध कर हिंदी के नए कीर्तिमान स्थापित किए। उनकी रचनाएं आमजन की रचनाएं हैं। लोकहित में लिखी गई उनकी रचनाएं वट वृक्ष के समान पल्लवित हुई हैं।
सामाजिक सरोकारों की भावना से ओतप्रोत साहित्य के साथ सामाजिक विसंगतियों और कुरीतियों पर भी अपनी लेखनी चलाई। उनकी रचना तिलतिल मिटुंगा, पर दया की भीख लूंगा नहीं जैसी स्वाभिमान को जाग्रत करने वाली पंक्तियों को लिखने वाले सुमन जी युग कवि हैं। उनके साहित्य में पूरा युग बोलता है।
प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु की नीतियों से आहत होकर, यहीं कहीं वो भटक गया है सत्ता के गलियारों में, मुझको मेरा लाल जवाहर वापस दे दो... लाल किले के मंच पर कविता पढ़कर पूरे श्रोताओं सहित नेताओं को सोचने पर विवश कर दिया था। झगरपुर में जन्म लेने के बाद वह रीवा ग्वालियर आदि स्थानों में रखकर आरंभिक शिक्षा प्राप्त की।
मध्यप्रदेश में रहने के बावजूद भी अपनी जन्मस्थली से जीवन के अंतिम दिनों तक प्रेम बनाए रखा। उनकी साहित्यिक यात्रा 27 नवंबर 2002 को पूरी हुई।
प्रमुख रचनाएं
हिल्लोल ,जीवन के गान, प्रलय, सृजन, युग का मोल, विश्वास बढ़ता ही गया, मिट्टी की बारात, महादेवी की काव्य साधना, गीती काव्य, प्रकृति पुरुष कालिदास नाटक आदि।
यह मिले सम्मान
1999 में पद्म भूषण ,1958 में देवा ,1974 में सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, 1973 में भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा लिटरेचर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।