निर्यातकों की बेरुखी से जिले के बासमती चावल की
खुशबू ‘उड़’ गई है। मांग कम होने से बासमती के दाम औंधे मुंह गिर गए हैं।
आलम यह है कि पिछले साल 5500 रुपये क्विंटल बिकने वाला बासमती चावल इस बार
2400 रुपये में मारा-मारा फिर रहा है।
उचित कीमत न मिलने से किसान
निराश हैं। दामों में आई गिरावट के पीछे पिछले साल बासमती चावल की रिकार्ड
खरीददारी और खाड़ी देशों में निर्यातकों का पैसा फंस जाना बड़ा कारण माना
जा रहा है। इसके अलावा सूखे की वजह से चावल की क्वालिटी में भी गिरावट आई
है, जो स्टैंर्ड मानक से कम है।
मंडी के जानकारों की मानें तो
पिछले वर्ष बासमती चावल का निर्यात बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने मंडी
शुल्क और कुछ छूटें व्यापारियों को दी थी। इस वजह से हरियाणा और पंजाब के
निर्यातकों ने यहां से बड़े पैमाने पर खरीददारी शुरू कर दी।
निर्यातकों
की प्रतिस्पर्धा के चलते बासमती के दाम 3500 से बढ़कर 5500 रुपये क्विंटल
पहुंच गए। इससे उनकी लागत बढ़ गई। निर्यातकों ने चावल खाड़ी देशों को
निर्यात किया तो उन्हें खास फायदा नहीं हुआ। इस कारण कई ने निर्यात करना ही
बंद कर दिया।
जिन्होंने निर्यात भी किया, उनका वहां पैसा फंस गया।
कई निर्यातकों के पास पिछले वर्ष का ही स्टॉॅक है। इस कारण इस बार बासमती
की खरीददारी में खास रुचि नहीं दिखाई। दूसरा कारण यह भी रहा कि इस बार
प्रदेश में सूखा पड़ने की वजह से बासमती की क्वालिटी में गिरावट आ गई।
पहले
बासमती की एक बोरी में 60 से 62 किलो की भरान होती थी। चावल हल्का होने से
यह भरान 55 किलो तक पहुंच गई है। पुरवा मंडी सचिव अमित गुप्ता के मुताबिक
एक्सपोर्ट क्वालिटी के बासमती चावल का स्टैंडर्ड साइज 708 एमएम (लंबा) होता
है लेकिन इस बार स्टैंडर्ड साइज घटकर 701 एमएम रह गया है।
इसके
अलावा चावल हल्का भी हुआ है। यही कारण है कि इस बार निर्यातकों ने यूपी के
चावल की जगह पंजाब और हरियाणा के बासमती चावल को प्राथमिकता दी।
पिछले
वर्ष हुई बासमती की रिकार्ड और ऊंचे दामों पर खरीददारी का असर भी है।
बासमती की मंडी में आवक ज्यादा होने और बिकवाली कम होने से दामों पर असर
पड़ रहा है। दामों में साठ फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है।