जिले की इकलौती किसान सहकारी चीनी मिल की दुश्वारियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। चीनी मिल का मौजूदा घाटा 2.80 अरब का आंकड़ा छू चुका है। ग्रेच्युटी व पीएफ समेत कर्मचारियों का 11.55 करोड़ का देय भी लंबित है। तमाम दावों के बावजूद सरकार के नुमाइंदे चीनी मिल को बदहाली के दायरे से बाहर नहीं ला सके हैं।
नब्बे के दशक की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के पुत्र स्व. संजय गांधी जिले के दौरे पर आए थे। लोगों की मांग पर उन्होंने चीनी मिल की स्थापना का आश्वासन दिया था। उनके प्रयास से चीनी मिल के लिए कार्ययोजना तैयार की गई थी।
वर्ष 1984 में जिले की इकलौती किसान सहकारी चीनी मिल का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने किया था। तब चीनी मिल की पेराई क्षमता 1250 क्विंटल थी। मिल की स्थापना के बाद किसानों का गन्ने की खेती की ओर तेजी से रुझान बढ़ा। किसानों के अथक परिश्रम से जिले में गन्ने का पर्याप्त उत्पादन होने लगा।
समय बीतने के साथ ही मिल के कल-पुर्जे जर्जर होने लगे। तीन दशक बाद भी मिल के कल-पुर्जे को बदलने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है। हालत यह है कि गन्ना पेराई के दौरान कई बार तकनीकी खराबी की वजह से ही मिल बंद हो जाती है। इससे मिल को सालाना लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है।
32 वर्ष बीते जाने के बावजूद मिल की पेराई क्षमता नहीं बढ़ सकी है। चीनी मिल के उपाध्यक्ष उमेश प्रताप सिंह के मुताबिक मौजूदा समय में चीनी मिल 2.80 अरब के घाटे में चल रही है। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन मद में लगभग चार करोड़ रुपये का बकाया हो गया है।
धनाभाव के कारण मिल के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को देय ग्रेच्युटी की धनराशि बढ़कर 1.55 करोड़ हो गई है। मिल के कर्मचारियों के पीएफ मद की धनराशि की देयता करीब 10 करोड़ तक पहुंच चुकी है। मिल की दयनीय हालत से गन्ना किसानों के बकाया मूल्य का भुगतान शासन/सरकार से मिली सहायता से कराया जा रहा है।
किसान सहकारी चीनी मिल के उपाध्यक्ष उमेश प्रताप सिंह ने बताया कि उन्होंने चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास के प्रमुख सचिव को बीते तीन अगस्त को पत्र लिखकर मिल का आधुनिकीकरण कराने के साथ ही पेराई क्षमता बढ़ाने की मांग की है।
कर्मचारियों के वेतन, ग्रेच्युटी व पीएफ मद की बकाया राशि, सामानों के आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान कराने और मिल की रिपेयरिंग व मेंटीनेंस के लिए 20 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता की मांग की है।
जिले के विभाजन के बाद इंडस्ट्री के नाम पर अब सिर्फ किसान सहकारी चीनी मिल ही बची है। मुंशीगंज का एचएएल, जगदीशपुर का बीएचईएल, छीड़ा का गैस प्लांट सुल्तानपुर से कटकर अमेठी जिले का हिस्सा हो गया है। अमेठी क्षेत्र के कई अन्य छोटे कारखाने भी निकल गए हैं। सुल्तानपुर के लोगों को इंडस्ट्री के नाम पर चीनी मिल से संतोष करना पड़ रहा है।