सरकार प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पानी की तरह बहा रही है लेकिन परिषदीय स्कूलों की व्यवस्था बेपटरी है। हालत यह है कि मोतिगरपुर ब्लॉक का प्राथमिक विद्यालय लामा बनकठा 11 सालों से पेड़ों के नीचे चल रहा है। बच्चे रोज सुबह रसोइया के घर से श्यामपट सिर पर लादकर स्कूल ले आते हैं और शाम को यथा स्थान पहुंचा देते हैं। बच्चों के अगल-बगल मवेशी गोबर कर रहे होते हैं। पास में स्थित तालाब से खतरे का अंदेशा अलग से बना रहता है।
बारिश होने पर बच्चों की छुट्टी कर दी जाती है। बच्चों का दोपहर का भोजन रास्ते पर होता है। ये हालात 2005 से निर्माणाधीन विद्यालय भवन के मुकदमेबाजी में फंसने से पैदा हुए हैं। महकमा इसकी कोई वैकल्पिक व्यवस्था अब तक नहीं कर सका है।
लामा बनकठा प्राथमिक विद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को विद्यालय भवन न होने की वजह से तालाब के किनारे बाग में मवेशियों के बीच खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। ब्लैक बोर्ड, कुर्सियां और आवश्यक रजिस्टर रसोइया के घर से प्रतिदिन बच्चे स्वयं सिर पर लादकर ले आते हैं और छुट्टी होने पर यथा स्थान पहुंचा देते हैं। स्कूल में पेयजल के लिए हैंडपंप की व्यवस्था नहीं है। पानी पीने के लिए गांव में लगे हैंडपंप पर जाना पड़ता है।
विद्यालय में कुल 75 बच्चे पंजीकृत है, जिनको पढ़ाने की जिम्मेदारी चार शिक्षकों पर है। यह हालात विद्यालय भवन के मुकदमेबाजी में फंसने से पैदा हुए हैं। लामा बनकठा गांव में वर्ष 2005-06 में शासन ने विद्यालय स्थापना की स्वीकृति दी थी। विद्यालय भवन निर्माण के लिए पांच लाख रुपये विद्यालय के खाते में भेजते हुए निर्माण प्रभारी तत्कालीन प्रधानाध्यापक रामगोपाल तिवारी को दी गई थी। प्रधानाध्यापक ने निर्माण कार्य शुरू कराया।
जब लगभग छह फिट तक दीवार खड़ी हो गई, तभी गांव के ही गंगाराम शर्मा ने भूमि को अपनी बताते हुए सिविल न्यायालय कादीपुर की अदालत वाद दायर कर दिया। जिस पर बाद में उन्हें स्थगनादेश मिल गया। तब से तारीख पर तारीख लगती चली आ रही है। भवन निर्माण में लगभग एक लाख पैंसठ हजार रुपये खर्च हो चुके हैं। मौजूदा समय में विद्यालय में प्रभारी प्रधानाध्यापक विमल वर्मा, सहायक अध्यापक राज बहादुर वर्मा, दशरथ यादव और दिव्यांश विक्रम सिंह के अलावा दो रसोइया मालती देवी और चंपा देवी तैनात हैं।