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दशकों पुराना है इसौली में रामलीला का इतिहास

Wed, 28 Sep 2016 10:48 PM IST
Amarujala Bureau
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हिन्दु मुस्लिम एकता का प्रतीक - फोटो : अमर उजाला
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कुड़वार। कस्बे में पिछले 22 सालों से होती आ रही रामलीला पर इस बार संकट के बादल मंडराने लगे हैं। रामलीला समिति को आर्थिक व जनसहयोग नहीं मिलने से कार्यकर्ताओं ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हिंदू-मुस्लिम के सहयोग से आयोजित होने वाली रामलीला का जिले में प्रमुख स्थान रहा है। पूर्व प्रधान नौशाद के गीत ‘राम जी की सेना चली, हर-हर महादेव’ की गूंज आज भी लोगों के दिलों में गूंजती है। राम, लक्ष्मण व सीता का रामलीला में किरदार निभाने वाले स्थानीय पात्र रामलीला बंद होने से नाराज हैं।
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सरदार गुरप्रीत सिंह रामलीला में भगवान शंकर का रोल निभाकर चार चांद लगा देते थे।  वर्ष 1985 से क्षेत्र के बौढ़ियाबालमऊ में आयोजित हो रही रामलीला हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनी है। इस रामलीला में रमसापुर, खटकीकास्त चिरान, सुंदरपुर समेत कई गांव के लोग भाग लेते हैं। तीन दशक पुरानी आदर्श रामलीला समिति बौढिय़ाबालमऊ की स्थापना 1985 में गांव के ही सिद्वनाथ मिश्र ने की थी। यह रामलीला दो गांवों रमसापुर व बौढ़ियाबालमऊ के बीच होती आ रही है। रामलीला का मंचन दशहरा के छठवें दिन शुरू होता है और आगे छह दिनों तक चलता है। मंचन के स्थान की साफ-सफाई इदरीस अली के जिम्मे रहती है।

मंडप, डेरा व तंबू की व्यवस्था अब मो. रजा के पुत्र मो. देखेंगे। पिछले 12 साल से गांव के आबिद अली उर्फ पप्पू माता जानकी की भूमिका कर रहे हैं। पास के गांव सुंदरपुर के मो. सलाउद्दीन विभीषण की भूमिका निभाते हैं। रामलीला में राम का किरदार जितेंद्र मिश्र, भरत का बालमुकुंद, वशिष्ठ का सत्य नारायण यादव, रावण का महंथ बहादुर सिंह व अहिरावण का अवधेश मिश्र करते आ रहे हैं। इस बार की रामलीला को संपन्न कराने की जिम्मेदारी कमलेश पाल को दी गई है।
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