सुल्तानपुर। यूपी बोर्ड हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के आए परीक्षा परिणाम ने जिले की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। इस बार भी अपने संसाधनों के भरोसे चल रहे वित्तविहीन विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने शानदार प्रदर्शन कर बाजी मार ली, जबकि सरकारी और सहायता प्राप्त अशासकीय विद्यालय मेरिट ही नहीं, अच्छे अंकों की दौड़ में भी पिछड़ गए।
जिले के टॉप-10 में एक स्थान छोड़ बाकी सभी स्थानों पर निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों ने कब्जा जमाया है। इसके उलट, बेहतर भवन, संसाधन और वेतनभोगी स्टाफ होने के बावजूद राजकीय और अनुदानित विद्यालयों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। जिले में कुल 341 माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं, जिनमें 25 राजकीय और 58 सहायता प्राप्त अशासकीय विद्यालय शामिल हैं। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन अपेक्षित शैक्षिक परिणाम नहीं मिल पा रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. एनके सिंह का मानना है कि पढ़ाई की गुणवत्ता, अनुशासन और प्रतिस्पर्धी माहौल के अभाव ने सरकारी स्कूलों को पीछे धकेल दिया है। वित्तविहीन विद्यालयों में सीमित संसाधनों के बावजूद नियमित कक्षाएं, निगरानी और परीक्षा केंद्रित तैयारी पर जोर दिया जा रहा है। जिला विद्यालय निरीक्षक सूर्य प्रकाश सिंह ने स्वीकार किया कि विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती है। बताया कि शासन स्तर पर नियुक्तियों की मांग लगातार उठाई जा रही है, लेकिन अभी तक पर्याप्त सुधार नहीं हो सका है।
- सरकारी व अनुदानित स्कूलों की प्रमुख कमियां।
-भौतिकी और रसायन विज्ञान जैसे विषयों में विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी।
-अन्य विषयों के शिक्षक पढ़ाने को मजबूर, गुणवत्ता प्रभावित।
-पढ़ाई में नियमित निगरानी और प्रतिस्पर्धी माहौल का अभाव।
-संसाधन होने के बावजूद उनका प्रभावी उपयोग नहीं।
-समय पर शिक्षक भर्ती न होने से लगातार बढ़ रहा शैक्षिक अंतर।