दूबेपुर (सुल्तानपुर)। जिला अस्पताल के चिकित्सक अपेक्षाकृत नियंत्रित हालत के मरीजों तक को ट्रामा सेंटर रेफर कर बला टालते हैं। कई बार हालत ऐसे हो जाते हैं कि ट्रॉमा सेंटर में ऐसे मरीजों को भर्ती ही नहीं किया जाता है। दूसरी तरफ जिले का ट्रॉमा सेंटर शोपीस बना है। स्टाफ, चिकित्सक व संसाधनों के अभाव में इसका लाभ जिले के लोगों को नहीं मिल पा रहा है।
रोजाना हाईवे पर होने वाली मार्ग दुर्घटनाओं के मद्देनजर शासन ने जिले के अमहट के पास ट्रॉमा सेंटर खोलने की अनुमति दी थी। ट्रॉमा सेंटर निर्माण में करीब ढाई करोड़ रुपये खर्च हुए थे। अगस्त 2016 में सात हजार वर्ग फुट जमीन पर ट्रॉमा सेंटर बनकर तैयार हो गया था। ट्रॉमा सेंटर में बाकायदा आर्थोपेडिक और न्यूरो सर्जन के साथ ही 10 चिकित्सकों के अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती की गई थी। व्यवस्था के तहत सेंटर में आईसीयू, सीटी स्कैन मशीन, अल्ट्रासाउंड, वेंटीलेटर मशीन समेत सभी जरूरी उपकरण और दवाएं भी उपलब्ध कराई गई थी। स्वास्थ्य विभाग को 22 सितंबर 2016 को ट्रॉमा सेंटर चालू हालत में दे दिया गया था।
एक एजेंसी ने जून 2017 तक ट्रॉमा सेंटर का संचालन किया था, लेकिन मरीज न मिलने की वजह से वह इसे जिले के स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर कर चली गई। हैरत की बात यह है कि जिला अस्पताल से प्रतिमाह 20 मरीज ट्रॉमा सेंटर लखनऊ के लिए रेफर किए जाते हैं। इन मरीजों में अधिकांश समय से उपचार न मिल पाने की वजह से रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। मौजूदा समय में ट्रॉमा सेंटर में ईएमओ डॉ. सूर्यकांत, मेल स्टाफ नर्स अशोक कुमार, अजय सिंह, वार्डबॉय हरिप्रसाद, सफाई कर्मचारी राजकुमार की तैनाती है। इसमें अधिकांश ड्यूटी से नदारद रहते हैं। जिला अस्पताल के चिकित्सक गंभीर मरीजों को जिले के ट्रॉमा सेंटर रेफर करना ही नहीं चाहते हैं। इसके पीछे चिकित्सकों का तर्क होता है कि मरीज के परिवारीजन ही लखनऊ रेफर करने की जिद करते हैं।