सुल्तानपुर। हिंदी भाषा हिंदुस्तान की पहचान है। विदेशों में भारतीयों की पहचान हिंदी भाषी के रूप में ही होती है। अमर उजाला के हिंदी हैं हम... अभियान के तहत विदेशों में रह रहे जिले के कुछ नागरिकों से बात हुई तो उन्होंने हिंदी के प्रति अपने प्रेम को साझा किया। साथ ही विदेशों में उनकी ओर से हिंदी की मजबूती के लिए किए जा रहे प्रयासों पर भी चर्चा की।
जिले के कादीपुर तहसील क्षेत्र के बलुआ गांव निवासी तिलकधारी सिंह के पुत्र सुधीर सिंह पिछले 28 वर्षों से बुल्गारिया के सोफिया शहर में निवास करते हैं। टूर एंड ट्रेवेल्स का बिजनेस करने वाले सुधीर सिंह विदेश में हिंदी की अलख जगाए हुए हैं। उनकी पत्नी कात्रिन बुल्गारिया की ही मूल निवासी हैं। परिवार में बेटी रुक्मिणी पढ़ाई कर रही है। वे परिवार व अपने देश के लोगों से हिंदी में ही बात करते हैं। साथ ही विदेशी मूल के लोगों को भी हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि जो अपनत्व अपनी हिंदी भाषा मे मिलता है वो दूसरी भाषा में नहीं है।
जिले के लंभुआ तहसील क्षेत्र के राजापट्टी गांव निवासी डॉ. प्रेम साहब सिंह चिकित्सक हैं। वे बीते 23 साल से रूस के वोलगोग्राद सिटी में सपरिवार रहते हैं। डॉ. प्रेम साहब सिंह के अंदर भारतीयता कूट-कूट कर भरी हैं।
विदेश में रहकर भारतीय सामानों के बाजार का आयोजन करवाना हो या योग दिवस पर योग करवाना, सभी कार्यक्रमों इनकी सहभागिता बढ़-चढ़कर रहती है। उन्होंने न सिर्फ योग सेंटर खुलवाया है, बल्कि साल भर में कई बार आयुर्वेद का उपचार, भारतीय चिकित्सक के माध्यम से हर्बल दवाइयां मरीजों को उपलब्ध करवाते रहते हैं। कहते हैं कि हिंदी और अवधी भाषा सबसे प्रिय है। हिंदी के प्रचार-प्रसार में योगदान करना हमारा नैतिक दायित्व है।
जिले के निवासी डॉ. विनोद कुमार पांडेय रूस के मास्को शहर में रहते है। वे अपने व्यवसाय के साथ ही रूसी नागरिकों को हिंदी भी सिखा रहे हैं। डॉ. विनोद पांडेय कहते हैं कि मुझे अपनी भारतीय संस्कृति से बहुत प्यार है। मैं हमेशा अपने रूसी दोस्तों को अपनी संस्कृति के अनुसार समझाने की कोशिश करता हूं। मैं भारतीय परिवार और रूस में रहने वाले नए छात्रों का समर्थन करता हूं।
अगर कोई भारतीय रूस में आया हुआ है और किसी भी तरह की परेशानी में है। पता चलने पर मैं उसकी समस्या का पूरी तरह निवारण करने की कोशिश करता हूं। मॉस्को में एक भारतीय मंदिर है। मैं अक्सर भारतीय मंदिर में जाता हूं। मैं अपने अनुभव और अपनी संस्कृति सभी रूसी दोस्तों को देता हूं। उन्हें हिंदी सिखाने का प्रयत्न करता हूं।
जिले के अखंडनगर विकास खंड क्षेत्र के सहतपुर गांव निवासी डॉ. रामेश्वर सिंह रूस में हिंदी साहित्य साधना में जुटे हैं। शुरू से ही साहित्यिक रुचि रखने वाले जेएनयू से स्नातक करने के बाद 1982 में रूस पढ़ाई करने गए थे। मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट करने के बाद वे वहीं बस गए। वे मास्को से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी पत्रिका दिशा के संपादक भी हैं।
हिंदी साहित्य से गहराई से जुड़े डॉ. रामेश्वर को हिंदी और हिंदुस्तान की मिट्टी के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश अप्रवासी भारतीय रत्न के सम्मान से नवाजा है। अयोध्या शोध संस्थान की ओर से उन्हें दीपोत्सव-2018 के दौरान सम्मानित किया गया है। डॉ. रामेश्वर कहते हैं कि रूस और भारत की वर्षों पुरानी दोस्ती में दोनों देशों की सभ्यता का भी आदान-प्रदान होना चाहिए।