बेसिक शिक्षा महकमे के आंकड़ों की मानें तो जिले के प्राइवेट स्कूलों में एक भी गरीब बच्चे को दाखिला नहीं दिया गया है। महकमे की ओर से चार साल से शासन को शून्य रिपोर्ट भेजी जा रही है। इसके पीछे कड़े मानक को वजह बताया जा रहा है। उधर, प्राइवेट विद्यालय संचालकों का कहना है कि उनके यहां नियमानुसार गरीब बच्चों का प्रवेश लिया गया है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों का दाखिला करने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए 75 और 25 का अनुपात निर्धारित है। मतलब अगर 100 बच्चे का प्रवेश लिया जाए तो 25 बच्चों से फीस नहीं वसूली जा सकती है।
बीएसए के स्टेनो जय प्रकाश तिवारी ने बताया कि शासन के आदेश पर विद्यालयों से रिपोर्ट मांगी गई है। प्राइवेट विद्यालयों में एक भी बच्चे का प्रवेश नहीं लिया गया है। बीते चार साल से शासन को शून्य की रिपोर्ट भेजी जा रही है। यही स्थिति अन्य जिलों की भी है।
पूरे प्रदेश में मात्र चार-पांच जिले में इक्का-दुक्का विद्यालयों में बीपीएल श्रेणी के बच्चों का प्रवेश लिया गया है। गरीब बच्चों का प्रवेश लेने वाले विद्यालय प्रशासन को फीस के तौर पर शासन से धनराशि दी जाती है। प्रति माह 60 रुपये के हिसाब से विद्यालय प्रबंधक के खाते में विभाग से पैसा भेजा जाता है लेकिन जिले में शून्य संख्या होने से इस मद में महकमे को एक भी पैसा नहीं मिला है।
जिले के प्रतिष्ठित विद्यालय शहर के सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक
विद्यालय विवेकानंदनगर के प्रधानाचार्य डॉ. लालता प्रसाद पांडेय ने बताया
कि उनके यहां मध्यम व गरीब वर्ग के बच्चे ही पढ़ते हैं। ग्रामीणांचल से
ज्यादातर बच्चे साइकिल से पढ़ने आते हैं। शासन व प्रशासन के सभी आदेश व
निर्देश का पालन किया जाता है।
शहर के करौंदिया स्थित कमला विद्या
मंदिर के प्रधानाचार्य प्रेम श्रीवास्तव ने बताया कि उनके यहां गरीब परिवार
के बच्चों को छूट मिलती है। मजदूर के बच्चे, अनाथ आदि के साथ ही गरीब
बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाया जाता है। गरीब बच्चों के पढ़ाई में मदद
की जाती है।
बीएसए के स्टेनो ने बताया कि गरीब बच्चों का प्रवेश लेने के लिए शासन से मानक निर्धारित है। शासनादेश के मुताबिक प्राइवेट विद्यालय के आसपास के परिषदीय व राजकीय विद्यालय के प्रधानाचार्य व न्याय पंचायत स्तर से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है। इसके बाद ही प्राइवेट विद्यालय में गरीब बच्चों का प्रवेश होता है। परिषदीय विद्यालयों में छात्रों की संख्या वैसे भी कम है।
ऐसे में कोई भी प्रधानाध्यापक अनापत्ति प्रमाण पत्र देने के लिए तैयार नहीं होता है। अधिकतर प्राइवेट स्कूलों में फीस के तौर पर प्रति माह 300 से 1200 रुपये लिए जाते है। शासन से निर्धारित प्रति छात्र फीस की रकम काफी कम होने से प्राइवेट स्कूल संचालक भी गरीब बच्चों के प्रवेश से गुरेज करते हैं।
प्रभारी बीएसए वैद्यनाथ कश्यप ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के प्रवेश के लिए शासन के आदेश का अनुपालन कराया जाएगा। अगर कोई विद्यालय संचालक नियम का उल्लंघन करता मिला तो संबंधित के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।