चैत्र नवरात्र के पांचवें दिन रविवार को भक्तों ने देवी दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा अर्चना की। देवी मंदिरों से लेकर घरों तक में सुबह से ही मां कात्यायनी की स्तुति में या देवि सर्वभूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: के मंत्र गूंजते रहे। व्रत धारण किए लोगों ने कलश स्थापित विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। नवरात्र में देवी मंदिरों पर भक्तों की भीड़ रोजाना उमड़ रही है।
रविवार को नवदुर्गा के छठवें रूप मां कात्यायनी की आराधना की गई। इनकी उपासना से रोग, शोक और भय नष्ट हो जाते हैं। कहा जाता है महर्षि कात्यायन की तपस्या से खुश होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। दूसरी कथा यह है कि जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इनकी पूजा की।
इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा। शहर से सटे लोहरामऊ के देवी मंदिर, शाहगंज स्थित मां काली मंदिर, रुद्रनगर स्थित मां नयना माता मंदिर समेत सभी देवी मंदिरों पर दर्शन पूजन के लिए भक्तों की भीड़ रही। कलश स्थापित कर नौ दिनों तक व्रत रखने वाले भक्तों ने भी मां के इस स्वरूप की विधि विधान से पूजा-अर्चना की। देवी मंदिरों में सुबह से लेकर रात तक घंटे, शंख व नगाड़े बजते रहे।