सावन को लगे 15 दिन बीतने को हैं। गांवों में झूलों पर पैंगे मारने के साथ ही ‘झूला पड़ा कदंब की डाल...’ जैसे गीत अब सिर्फ यादों में सिमटकर रह गए हैं। झूलों के लिए शहर में पेड़ की कमी प्रमुख वजह बनी है। गांव-गिरांव में आपसी वैमनस्य के चलते लोगों ने सावन में भी झूले से दूरी बना ली है। झूले की परंपरा लुप्त होने के पीछे सबसे प्रमुख वजह मनोरंजन के भरपूर साधन भी हैं। अब ग्रामीण इलाकों में लोग अपने घरों के पास पेड़ों पर बच्चों के लिए छोटा झूला डालते हैं।
वर्षा ऋतु में सावन की खूबियां अब किताबों तक ही सीमित रह गई हैं। प्रकृति के साथ जीने की परंपरा थमती जा रही है। सावन में एक माह तक शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में झूला झूलने का दौर भी अब समाप्त हो गया है। आधुनिकता की इस भागदौड़ में प्रकृति के संग झूला झूलने की बात अब कहीं नहीं दिखाई पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्र की युवतियां व महिलाएं भी सावन के झूलों का आनंद नहीं उठा पाती हैं।
दो दशक पहले झूलों और मेंहदी के बिना सावन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वर्तमान में सावन के झूले नजर ही नहीं आते हैं। बुद्धिजीवी इसका मुख्य कारण जनसंख्या में वृद्धि के साथ ही वृक्षों की अंधाधुंध कटान को मानते हैं। शहर व कस्बे के लोग अब घर की छत पर या फिर आंगन में ही रेडीमेड फ्रेम वाले झूले पर झूलकर मन को संतुष्ट कर रहे हैं।