सुल्तानपुर। जिले में बदलते मौसम के मिजाज ने गेहूं किसानों को संकट के दौर में ला खड़ा किया है। धूप और बादलों के बीच जारी आंखमिचौली के साथ शुक्रवार को हुई हल्की बूंदाबांदी ने तैयार खड़ी फसल पर खतरा बढ़ा दिया है। हालात यह हैं कि किसान दिन-रात एक कर किसी भी तरह फसल काटकर सुरक्षित घर पहुंचाने की कोशिश में जुटे हैं।
भदैंया क्षेत्र के अभियाखुर्द, अभियाकला और शंकरपुर गांवों में कंबाइन मशीनों की आवाज लगातार सुनाई दे रही है। खेतों में तेजी से गेहूं व सरसों कटाई का काम चल रहा है। किसान राजेंद्र पांडेय बताते हैं कि पिछले दस दिनों से मौसम का कोई भरोसा नहीं है। हौसिला पांडेय और इंद्र प्रकाश पांडेय जैसे किसान भी मशीनों के सहारे समय से पहले कटाई कराने को मजबूर हैं। बल्दीराय क्षेत्र में रीपर बाइंडर मशीनों की मांग तेजी से बढ़ी है।
छतौना गांव के पास 900 रुपये प्रति बीघा की दर से कटाई कराई जा रही है। किसान सोहेल अहमद का कहना है कि मौसम के डर से ज्यादातर किसान मशीनों का सहारा ले रहे हैं, जिससे लागत बढ़ती जा रही है। मजदूरों की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अनिश्चित मौसम और तेज धूप से मजदूर खेतों में काम करने से बच रहे हैं। ऐसे में किसान परिवार के साथ खुद ही खेतों में उतर रहे हैं। किसान देवराज यादव कहते हैं कि खेती ही जीवन का आधार है, इसलिए बच्चों के साथ खुद कटाई कर रहे हैं, देरी का मतलब नुकसान है।
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मौसम को देखते हुए किसान सुरक्षित करें फसल
कृषि विज्ञान केंद्र बरासिन के वैज्ञानिक डॉ. शशांक शेखर सिंह ने सलाह दी कि पकी फसल की जल्द मड़ाई कर उपज को सुरक्षित स्थान पर रखें। वहीं, कृषि वैज्ञानिक ब्रह्मराज पांडेय ने बताया कि यह बदलाव पश्चिमी विक्षोभ के कारण है।
मौसम पर्यवेक्षक डॉ. अमरनाथ मिश्र के अनुसार शुक्रवार को अधिकतम तापमान 35.5 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 21 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। आगामी 24 घंटों में आंशिक बादल छाने और कहीं-कहीं बूंदाबांदी की संभावना बनी हुई है।
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बारिश हुई तो दाने काले पड़ जाएंगे
धनपतगंज के किसान छोटेलाल यादव कहते हैं कि मौसम का मिजाज देखकर डर लग रहा है। अगर बारिश हो गई तो मड़ाई रुक जाएगी और गेहूं के दाने काले पड़ जाएंगे, जिससे पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता है।
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हर दिन आसमान देखकर बढ़ रही है चिंता
किसान श्याम बहादुर सिंह बताते हैं कि सुबह उठते ही आसमान देखते हैं। कभी धूप तो कभी बादल, इसी में गेहूं की कटाई कर रहे हैं। कंबाइन से कटाई भी महंगी हो गई है, लेकिन नुकसान से बचने के लिए मजबूरी में खर्च करना पड़ रहा है।