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अंग्रेजी के प्रवक्ता ने लड़ी हिंदी की लड़ाई

Fri, 13 Nov 2015 10:19 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/सुल्तानपुर
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वर्ष 2009 से हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की लड़ाई में पीएमओ तक को कटघरे में खड़ा करने वाले आरटीआई एक्टीविस्ट डॉ. राकेश सिंह की असामयिक मौत से लड़ाई अधूरी रह गई। गरीबों-मजलूमों को न्याय दिलाने का मामला हो या पाक की जेलों में बंद 1971 की भारत-पाक लड़ाई के युद्घ बंदी की जानकारी इकट्ठा करने की कवायद। समाजसेवी डॉ. राकेश सिंह ने आरटीआई को अपना हथियार बनाया। हालांकि उनकी असामयिक मौत से आरटीआई के जरिए शुरू की गई कई लड़ाइयां नतीजे तक नहीं पहुंच पाएंगी।
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मूलत: जौनपुर जिले के सूरापुर में पैतृक आवास होने के बावजूद आईटीआई एक्टीविस्ट डॉ. राकेश सिंह ने सुल्तानपुर को ही अपनी कर्मस्थली बनाया। सूरापुर स्थित एक इंटर कॉलेज में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने कुछ दिन समाचार पत्रों में भी कार्य किया। वर्ष 2005 में केंद्र सरकार की ओर से जनसूचना अधिकार अधिनियम लागू करने के बाद उन्होंने इसे ही अपना हथियार बनाया। पत्रकारिता जीवन से ही गरीबों मजलूमों की लड़ाई लड़ने वाले डॉ. राकेश ने आरटीआई के जरिए कई बार केंद्र व प्रदेश सरकार को जानकारियां देने पर मजबूर कर दिया। चाहे वह पाक जेलों में बंद 1971 की भारत-पाक लड़ाई के सैनिक रहें हो या फिर अरब देश में मृत एक मुस्लिम महिला के पति का शव देश में लाने का मामला आरटीआई के जरिए सरकार को न्याय के लिए मजबूर कर दिया।

अंग्रेजी में जवाब मिलने पर था एतराज
अंग्रेजी के प्रवक्ता के पद हनुमत इंटर कॉलेज सूरपुर में कार्यरत रहते हुए डॉ. राकेश सिंह ने हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए वर्ष 2009 से लड़ाई शुरू की थी। हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने पीएमओ, रक्षा मंत्रालय, मानव संसाधन व भाषा एवं संस्कृति विभाग तक से पत्राचार शुरू किया था। कई पत्रों का सरकार के विभिन्न विभागों से अंग्रेजी में जवाब मिलने पर उन्होंने इस पर एतराज जताते हुए लिखा-पढ़ी की थी।
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सार्वजनिक करनी पड़ी युद्घबंदियों की सूचना
 1971 की भारत-पाक लड़ाई में पाक की जेलों में युद्घ बंदी बनाए गए सैनिकों की जानकारी केंद्र व रक्षा मंत्रालय से मांग कर उन्होंने सरकार को इसे सार्वजनिक करने पर मजबूर कर दिया। आरटीआई के जरिए उनके कई वर्षों के संघर्ष के बाद केंद्र सरकार ने पाक की जेलों में बंद 1971 के युद्व बंदियों की सूचना सार्वजनिक की। इसके बाद उन्होंने सरकार से उन्हें छुड़ाने एवं देश में लाने का पत्राचार शुरू किया।


सरकार ने शव मंगवाकर महिला को सौंपा
करौंदीकलां क्षेत्र के मेवपुर गांव निवासी रजिया बेगम के पति मुशर्रफ की मौत सऊदी अरब में हो जाने पर वहां की सरकार ने लाश देने से इंकार कर दिया। जानकारी मिलने पर आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश ने जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत इसकी लड़ाई लड़ी। केंद्र के विदेश मंत्रालय से लेकर कई विभागों में पत्राचार किया। अंत में उन्हें कामयाबी मिली। केंद्र सरकार ने अरब सरकार से महिला रजिया के पति मुशर्रफ का शव व मुआवजा उसके घर पहुंचाया। 
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