घर-घर फूड डिलीवरी करने वाले दिव्यांग। स्रोत- स्वयं
सुल्तानपुर। शारीरिक अक्षमता को मजबूरी मानकर घर बैठने के बजाय शहर के कुछ दिव्यांग युवाओं ने इसे अपनी ताकत बना लिया है। ये अब फूड डिलीवरी का काम कर न सिर्फ अपना खर्च चला रहे हैं, बल्कि स्वावलंबन की नई मिसाल भी कायम कर रहे हैं।
होटलों और रेस्टोरेंट से भोजन लेकर वह रोजाना ग्राहकों के घर तक पहुंचाते हैं। रास्ते की मुश्किलें और मौसम की चुनौतियां भी उनके हौसले को नहीं डिगा पातीं।
विशेष रूप से अनुकूलित वाहनों के सहारे ये युवा शहर के अलग-अलग इलाकों में डिलीवरी करते हैं। बारिश, गर्मी और खराब रास्तों के बीच समय पर ग्राहक तक पहुंचना उनके लिए चुनौती जरूर है, लेकिन काम के प्रति लगन आसान बना देती है। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के साथ जीने का जरिया है।
दिव्यांग हूं, किसी पर बोझ नहीं
रामचंद्र यादव बताते हैं कि फूड डिलीवरी का काम आसान नहीं है। कई बार खराब मौसम और दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता है, फिर भी कोशिश रहती है कि ग्राहक तक सामान समय पर पहुंचाया जाए। विनोद कहते हैं कि शरीर से दिव्यांग जरूर हैं, लेकिन किसी पर बोझ नहीं हैं। उनका कहना है कि दिव्यांगता को अपनी नियति मानकर घर बैठ जाना समाधान नहीं है। जीवन में मुश्किलें आती हैं, लेकिन अवसर तलाशकर आगे बढ़ना चाहिए। मेहनत और इच्छाशक्ति के बूते आत्मनिर्भर बना जा सकता है।