प्रशासनिक अव्यवस्था की जीती जागती मिसाल उस समय दिखाई दी जब एक पिता को अपने बेटे के शव को चार दिन तक लखनऊ-सुल्तानपुर के बीच लेकर दौड़-भाग लगानी पड़ी। चार दिन पहले गोमती में मिले किशोर के शव को लेकर लाचार पिता की ये मजबूरी ही कही जाएगी कि किसी ने उस पर तरस नहीं खाया। चिकित्सकों की लापरवाही का आलम यह रहा कि पोस्टमॉर्टम की कागजी औपचारिकता निभाते हुए पूरी बॉडी को लखनऊ के विधि विज्ञान प्रयोगशाला डीएनए जांच के लिए भेज दिया।
लखनऊ के चिकित्सकों ने शव को वापस भेजते हुए पूरा पोस्टमॉर्टम कराने की बात कही। सुल्तानपुर और लखनऊ का चक्कर काटकर थक चुके परिवारीजनों के सब्र का बांध बृहस्पतिवार को टूट गया और शव को कलेक्ट्रेट गेट के सामने रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। सूचना के बाद पहुंची पुलिस ने लोगों को समझा-बुझाकर मामला शांत कराया। देर शाम दो चिकित्सकों के पैनल ने दोबारा शव का पोस्टमॉर्टम किया। इस दौरान पुलिस विभाग की फील्ड यूनिट ने वीडियोग्राफी भी कराई।
कोतवाली देहात थाना क्षेत्र के नेकराही गांव निवासी अख्तर हुसैन का इकलौता बेटा सबील (15) पिछले दो दिसंबर की शाम को बारावफात का जुलूस देखने के लिए सुल्तानपुर शहर आया था। इसके बाद सबील वापस घर नहीं पहुंचा था। 10 दिसंबर को गोसाईंगंज थाना क्षेत्र के कोड़रे गांव के पास गोमती नदी के किनारे सबील का शव पाया गया था। शव का ऊपरी हिस्सा कंकाल में तब्दील हो गया था। घर वालों ने शव की शिनाख्त कपड़े, जूता, पर्स व मोबाइल फोन से की थी। थानाध्यक्ष अमरनाथ विश्वकर्मा ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया था। 11 दिसंबर को जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. राजेश गौतम और जिला महिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. राकेश यादव के पैनल ने शव का पोस्टमॉर्टम किया था।
चूंकि शव का ऊपरी हिस्सा जलजीव खा गए थे लिहाजा दोनों चिकित्सकों ने डीएनए जांच के लिए पूरी बॉडी ही लखनऊ के विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दी। परिवारीजन 12 दिसंबर को एक सिपाही के साथ शव लेकर लखनऊ पहुंचे तो वहां के चिकित्सक का माथा ठनका। लखनऊ के चिकित्सक ने पोस्टमॉर्टम करने वाले चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि डीएनए जांच के लिए मात्र कुछ पार्ट्स की जरूरत थी न कि पूरे शरीर की। पोस्टमॉर्टम की वीडियोग्राफी और फोटो भी नहीं खींची गई थी। चिकित्सक की सलाह पर परिवारीजन शव लेकर 13 दिसंबर की देर शाम सुल्तानपुर पहुंचे।