25 साल पहले हुए गुनाह के साये ने दरोगा देवेंद्र पांडेय का दामन नहीं छोड़ा। घटना के बाद उसने कई जिलों में नौकरी की। महल सरीखा आशियाना बनवाया और बेलासदा गांव का प्रधान भी बन गया लेकिन उम्र के उतार पर उसे गुनाह की सजा मिल ही गई। सीबीआई के फैसले में दोषी करार दिए जाने के बाद आरोपी फरार है। घर वालों का कहना है कि सीबीआई कोर्ट गए हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 17 किलोमीटर दूर स्थित बेलासदा गांव निवासी द्वारिका प्रसाद पांडेय का पुत्र देवेंद्र पांडेय 1977 में पुलिस विभाग में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती हुआ था। देवेंद्र पांडेय अपनी पत्नी निर्मला पांडेय और चार बेटे महेंद्र पांडेय, धर्मेंद्र पांडेय, जितेंद्र पांडेय और राजेंद्र पांडेय को साथ लेकर बरेली में किराए के मकान में रहता था। 1990 में देवेंद्र पांडेय का ट्रांसफर पीलीभीत हुआ। 12 जुलाई 1991 को तीर्थयात्रा से लौट रही बस में सवार 10 सिक्ख युवकों को उतारकर देर रात एनकाउंटर में मार दिया गया था।
एनकाउंटर टीम में देवेंद्र भी शामिल था। एनकाउंटर के बाद देवेंद्र पांडेय का एसएसआई पद पर प्रमोशन हुआ था। 2012 में देवेंद्र पांडेय इलाहाबाद से रिटायर हो गया। पीलीभीत एनकाउंटर मामले में सीबीआई कोर्ट ने 25 साल तक चली सुनवाई के बाद 47 पुलिस कर्मियों को फर्जी एनकाउंटर का दोषी पाया है। एक अप्रैल को सीबीआई के विशेष न्यायाधीश लल्लू सिंह का फैसला आने के बाद बेलासदा गांव में रिटायर्ड देवेंद्र पांडेय के घर सन्नाटा पसर गया। दो अप्रैल को समाचार पत्रों में छपी खबर में जब देवेंद्र पांडेय का नाम भी फरार 27 पुलिस कर्मियों की लिस्ट में आया तो वह घर छोड़कर भाग गया। हालांकि उसकी पत्नी और दो बेटे घर पर हैं।