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‘विश्व की सबसे बड़ी दूसरी भाषा हिंदी’

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सुल्तानपुर। हिंदी दिवस पर शुक्रवार को जिले भर के स्कूलों व कॉलेजों में विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। कहीं गोष्ठियां तो कहीं निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले मेधावियों को सम्मानित भी किया गया।
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कमला नेहरू भौतिक एवं सामाजिक विज्ञान संस्थान में पखवाड़े भर से चलने वाले विभिन्न कार्यक्रमों का शुक्रवार को हिंदी दिवस पर समापन हो गया। केएनआई के संस्कृत एवं राजनीति विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में श्रुतलेख, हिंदी निबंध, कथावाचन आदि प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन किया गया।

हिंदी साहित्य के डॉ. राधेश्याम सिंह ने कहा कि हिंदी दिवस की औपचारिकता पूरी करने मात्र से हिंदी को समृद्ध नहीं बनाया जा सकता है। बल्कि इसे ज्ञान विज्ञान की आधुनिकतम तकनीकी से जोड़ना होगा। अंग्रेजी के प्रवक्ता डॉ. विजय प्रताप सिंह ने कहा कि सुबह से शाम तक के व्यवहार में यदि बेड टी, ब्रश, ब्रेकफास्ट और गुड मॉर्निंग-गुड नाइट ही रहेगा तो हिंदी हाशिए पर पहुंच जाएगी।
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सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय विवेकानंद नगर में आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रो. डॉ. इंद्रमणि ने कहा कि आज हिंदी के विकास का रोना नहीं है। हिंदी विश्व की सबसे बड़ी दूसरी भाषा है। रामराजी सरस्वती बालिका विद्या मंदिर में भी हिंदी दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रधानाचार्या कुसुम सिंह समेत अन्य शिक्षिकाओं ने हिंदी के उत्थान पर प्रकाश डाला।

रामकली बालिका इंटर कॉलेज में हिंदी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शिक्षिकाओं व छात्राओं ने हिस्सा लिया। महात्मा गांधी स्मारक पीजी कॉलेज में हिंदी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में प्रवक्ता अरुण कुमार पांडेय ने कहा कि किसी भी स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र का विकास तभी संभव है, जब वहां की राष्ट्र भाषा, राजभाषा अपनी स्वभाषा में हो।

संत तुलसीदास पीजी कॉलेज कादीपुर में हिंदी विभाग के तत्वावधान आयोजित गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए डॉ. देव नारायण शर्मा चक्रधर ने कहा कि हिंदी भारत की गौरवपूर्ण भाषा है, जो समाज को रचनात्मक दिशा देती है। डॉ. इंदुशेखर उपाध्याय, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. करुणेश भट्ट, डॉ. राजनाथ दुबे, डॉ. सुनील त्रिपाठी ने अपने विचार रखे।
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