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अपनों ने ही डुबोई राहुल गांधी की नइया

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अपनों ने ही डुबोई राहुल गांधी की नैया
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अमेठी। कांग्रेस के गढ़ में शुमार अमेठी में राहुल गांधी की नैया डुबोने में पार्टी के स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं ने भी अहम भूमिका निभाई। पार्टी के कार्यकर्ता और पदाधिकारियों ने गांवों में वोट मांगने के लिए जाना तक मुनासिब नहीं समझा।

वहीं, भाजपा के कार्यकर्ता व आरआरएस के स्वयं सेवक लगातार गांवों में डेरा जमाए रहे। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसी खामी को पकड़ा भी और कुछ पदाधिकारियों को फटकार भी लगाई लेकिन उनका रवैया नहीं बदला।
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1980 में संजय गांधी के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के गढ़ में शुमार हो चुकी अमेठी में राहुल गांधी चुनाव हार चुके हैं। उनकी पराजय अमेठी से लेकर देश-विदेश तक में चर्चा का विषय बनी है।

हर कोई पराजय के कारणों के मंथन में लगा है। राहुल की पराजय में स्थानीय नेताओं, पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की निष्क्रिय भूमिका भी एक अहम कारण मानी जा रही है।

पार्टी से जुड़े लोगों ने क्षेत्र में वोट मांगना तक मुनासिब नहीं समझा। अधिकतर नेता कस्बों व गांव-गिरांव के चौराहों तक ही सिमटे रहे। हालांकि यह पहली बार नहीं हो रहा था। इसके पहले के चुनावों में भी वे यही करते रहे लेकिन तब कभी मुकाबला कांटे का नहीं था।

गांधी फैमिली के लोग आसानी से चुनाव जीत जाते थे और इनकी कारगुजारी भी दब जाती थी। इस बार स्मृति ईरानी के मैदान में होने के कारण मुकाबला कांटे का था। ऐसे में कार्यकर्ताओं व स्थानीय नेताओं की निष्क्रियता राहुल गांधी को भारी पड़ गई।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस खामी को पकड़ा भी था। उन्होंने प्रचार के दौरान आसपास घूमने वालों को फटकार लगाते हुए क्षेत्र में प्रचार-प्रसार में लगने की ताकीद भी की थी।

कुछ लोगों को कांग्रेस कार्यालय में फटकार लगाई थी लेकिन इनका रवैया नहीं बदला। वहीं, मुकाबले में स्मृति ईरानी के पक्ष में भाजपा कार्यकर्ताओं ने गांवों में अपना ध्यान ही केंद्रित नहीं कर रखा था बल्कि वे घर-घर जा रहे थे।
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक भी लगातार गांवों में जमे थे। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों का न केवल बखान कर रहे थे बल्कि राहुल की नाकामियों पर भी जोर रहे थे।
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