धरती का सीना चीरकर लोगों के लिए अन्न पैदा करने वाला जिले का अन्नदाता बदहाल है। औसतन कम बारिश से कृषि का दायरा पचास फीसदी कम हो गया है। जंगलों और पहाड़ों के अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण के चलते जंतुओं पर भी खतरा मंडरा रहा है। कई साल से औसत बारिश न होने से भी संकट खड़ा हुआ है। जल, जंगल और जमीन के दोहन से प्रदूषण बढ़ा है। इससे हर वर्ग प्रभावित है। 85 हजार हेक्टेयर से घटकर धान की पैदावार 33 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है।
जिला कृषि अधिकारी राजीव कुमार बताते हैं कि जिले में औसत बारिश का मानक 997.50 मिली से घटकर सात सौ मिली पर आ गया है। इससे कृषि भी प्रभावित हुई है। करीब पांच साल पहले धान की खेती का क्षेत्रफल 85 हजार हेक्टेयर था, लेकिन अब इसका दायरा काफी कम हो गया है। अब धान की खेती महज 33 हजार हेक्टेयर में ही होती है। शासन से खेती का मिलने वाला लक्ष्य बारिश न होने के चलते पूरा नहीं हो पाता। इसी तरह का हाल कृषि से जुड़े अन्य अनाजों का भी है। उधर वनों के दोहन का भी बेतहाशा हो रहा है। चोरी-छिपे कीमती पेड़-पौधे काट लिए गए। नगवां, चतरा और चोपन ब्लॉक क्षेत्र से जुड़े तरिया रेंज का जंगल कभी काफी घटा होता था लेकिन अब इन इलाकों में घनी बस्तियां हैं।
वन क्षेत्रों की जमीनों पर अवैध कब्जा कर बस्तियां बसाने वालों ने जंगलों को आग के हवाले कर दिया। कई बार ऐसी घटनाएं हुईं। गर्मी के दिनों में वनों को सुरक्षित रखने के वन विभाग के पास कोई इंतजाम न होने से जंगल के जंगल जल जा रहे। जिले में बालू और पत्थर के बेतहाशा अवैध खनन से भी जल, जंगल, जमीन पर खतरा बढ़ा है। सोनभद्र वन प्रभाग के डीएफओ एसवीपी सिंह कहते हैं कि पानी के मामले में सोनभद्र ड्राई जोन है। इसकी वजह अंधाधुंध ब्लास्टिंग, अवैध खनन, जल का दोहन और औद्योगिक कल कारखानों से निकलने वाले कचरों से होने वाला प्रदूषण है। समय रहते प्रदूषण पर रोक नहीं लगी तो स्थिति और भयावह होगी।