अश्विन मास की सप्तमी तिथि गुरुवार को माताओं ने जीवित्पुत्रिका व्रत की शुरुआत की। दूसरे दिन अष्टमी तिथि शुक्रवार को निर्जल और निराहार रहकर पुत्रों की दीर्घायु और मंगल कामना के लिए व्रत रखकर विधि-विधान से पूजन-अर्चन करेंगी। इस दौरान आठ कहानियां सुनकर, सोहर, बधाई आदि मांगलिक गीत गाकर व्रत करेंगी। तीसरे दिन नवमी तिथि शनिवार को माताएं पारण करेंगी।
राबर्ट्सगंज मेन चौक पर गुरुवार को खरीददारी करने गई नंदिनी, मधुलिका, साधना, गिरजा, ज्योति, पूनम, रेखा, सावित्री, मधुबाला, सीता आदि ने बताया कि जीवित्पुत्रिका व्रत में फल-फूल, मिष्ठान, खिलौना, जिउतिया, पूड़ी-पकवान, वस्त्र आदि चढ़ाकर बैर, कुश और पलाश की डाली गाड़ कर विधि-विधान से सामूहिक रुप से पूजन-अर्चन किया जाता है। पहले दिन सतपुतिया की सब्जी के साथ सिर्फ एकबार भोजन करके व्रत की शुरुआत की जाती है। दूसरे दिन निर्जल और निराहार रहकर पुत्र की दीर्घायु और मंगल कामना के लिए व्रत रखकर माताएं पूजन-अर्चन करती हैं।
इसके बाद आठ कहानियां सुनने का विधान है और उसी समय सोहर, बधाई आदि मांगलिक गीत गाकर व्रत किया जाता है। तीसरे दिन प्रसाद का वितरण किया जाएगा और व्रती माताएं पूड़ी-पकवान खाकर व्रत का पारण करेंगी। मान्यता यह है कि महाभारत के समय अश्वस्थामा ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर में जाकर पांडवों के पांच पुत्रों को पांडव समझ कर मार डाला, लेकिन वे सभी द्रौपदी के पुत्र थे।
अर्जुन ने अश्वस्थामा को बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली। इसके बाद अश्वस्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को मारने के लिए ब्रम्हस्त्र का प्रयोग कर दिया, किंतु उत्तरा की संतान को जन्म लेना भी जरूरी था। इसकी वजह से श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर पुन: जीवित किया। गर्भ में मृत्यु को प्राप्त होने के बाद भी जीवित जन्म लेने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा जो आगे चलकर राजा परीक्षित बना।