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Sonebhadra News: विवादों से रहा है नाता, यहां वर्चस्व खूब टकराता

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रेणुकूट। जिले की सबसे संवेदनशील रेणुकूट नगर पंचायत की सीट पर दावेदारों के बीच उठापटक तेज हो गई है। इस बार भी अनारक्षित श्रेणी में गए यहां के अध्यक्ष पद पर कइयों की निगाहें हैं। वर्चस्व को लेकर पहले हुई घटनाओं को देखते हुए प्रशासन यहां के चुनाव को लेकर अलर्ट है। अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश भी दिए हैं। चुनाव की तारीखों के एलान के बीच तेजी से बदलते समीकरणों ने माहौल को रोचक बना दिया है।
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औद्योगिक नगरी रेेणुकूट जिले की अन्य निकायों से अलग है। वर्ष 1995 से अब तक यहां सिर्फ चार चुनाव ही हुए हैं। बीच के कई साल कोर्ट में मामला जाने से चुनाव प्रक्रिया स्थगित रही। वर्ष 1995 में यहां पहली बार नगर पंचायत के लिए वोट पड़े थे। तब महिलाओं के लिए आरक्षित इस सीट से गायत्री देवी ने जीत हासिल की थी। उन्होंने मधुलिका श्रीवास्तव को पराजित किया। प्रथम कार्यकाल में ही चार वर्ष बाद नगर में स्थापित औद्योगिक संस्थान के कोर्ट में जाने से यहां के चुनाव पर स्थगनादेश पारित हो गया। जिला प्रशासन, औद्योगिक संस्थान और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कड़ी मशक्कत से चुनावी पर सहमति बनी तो फिर्र 2008 में यहां चुनाव हुआ। अनारक्षित सीट पर राकेश मौर्य को हराकर अनिल सिंह चेयरमैन बने। वर्ष 2012 में भी सीट अनारक्षित रही और अनिल सिंह ने ही निर्दलीय प्रत्याशी निशा सिंह को हराकर अपना दबदबा कायम रखा। वर्ष 2017 के चुनाव में फिर से सीट अनारक्षित हुई तो अनिल सिंह के हैट्रिक लगाने का सपना टूट गया। निर्दलीय प्रत्याशी शिवप्रताप सिंह बबलू कांटे की टक्कर में तत्कालीन चेयरमैन अनिल सिंह से तीन वोट से जीतकर नगर पंचायत अध्यक्ष बने।
चेयरमैन की हत्या के बाद हुआ था उपचुनाव
कार्यकाल पूरा होने से पहले ही 30 सितंबर 2019 को बबलू सिंह की उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद हुए उपचुनाव में बबलू सिंह की पत्नी मैदान में उतरीं। उन्होंने 3476 मत पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी अनिल सिंह को 1586 मतों से शिकस्त दी थी। इस चुनाव में कुल चार प्रत्याशी मैदान में थे। भाजपा के शारदा खरवार को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इस बार फिर से सीट अनारक्षित होने के बाद पूर्व के कई चेहरों के मैदान में होने की प्रबल आशंका जताई जा रही है। हाल में हुए कई घटनाक्रमों ने भी समीकरणों पर असर डाला है।
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