ऊर्जा जगत का प्राण कहे जाने वाले रिहंद डैम का दृश्य। ।
पावर हब कहे जाने वाले ऊर्जांचल के बिजलीघरों को लगातार कई साल अवर्षण की स्थिति में भी पानी की दिक्कत नहीं होगी। एनजीटी के निर्देश पर अपनाई गई वाटर रिसाइकलिंग (प्रयोग किए पानी का दोबारा प्रयोग) और कूलिंग प्रणाली ने पानी की खपत काफी घटाकर रख दी है। मौजूदा स्थिति में रिहंद डैम का महज डेढ़ से दो फीट पानी पूरे साल के लिए पर्याप्त है। अगर मंगलवार के जलस्तर पर ध्यान दें तो लगातार चार वर्ष बारिश न हो, तब भी बिजली परियोजनाओं को पर्याप्त पानी मिलता रहेगा।
राज्य सेक्टर की ओबरा, अनपरा, अनपरा डी, निजी क्षेत्र की लैंको, हिण्डाल्को रेणुकूट, हिण्डाल्को रेणुपावर, एनटीपीसी रिहंद, एनटीपीसी सिंगरौली, देश के सबसे बड़े विद्युत गृह एनटीपीसी विंध्याचल, रिलायंस का सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के पानी की जरूरत रिहंद डैम से पूरी होती है।
केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन साल से अवर्षण की स्थिति के चलते रिहंद डैम में क्षमता का 45 प्रतिशत के करीब ही जलभराव हो पाया है। पहले भी यह स्थिति बनती रहती है। इसको देखते हुए बिजलीघरों के लिए पानी संकट की संभावना जताई जाती रही है, लेकिन परियोजनाओं में पानी बचत के अपनाए गए तरीके के बाद हालिया खपत के आंकड़े इस मामले में काफी राहत देने वाले हैं।
विभागीय आंकड़े बताते हैं कि अब बिजली परियोजनाओं में रिहंद डैम के महज डेढ़ से दो फुट (एक मिलियन एकड़ फीट) पानी की जरूरत रह गई है। रिहंद डैम में न्यूनतम जलस्तर 830 और अधिकतम 880 फीट रखा गया है, लेकिन औसतन रिहंद डैम का जलस्तर 850 से 858 फीट तक ही पहुंच पा रहा है। बावजूद अगर बिजली परियोजनाओं की जरूरत पर ध्यान दें तो रिहंद डैम के पानी का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ तापीय बिजली परियोजनाओं के लिए संरक्षित रख दिया जाए तो आने वाले कई वर्षों में भी पानी की दिक्कत नहीं आने वाली है।