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घने जंगलों में पैदल घूमकर जगाई थी आजादी की अलख

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आदिवासी बहुल जिले के सेनानियों ने विपरीत हालात में भी दक्षिणांचल में आजादी की लौ को बुझने नहीं दिया। अंग्रेजी सरकार की यातनाएं झेलने के बाद भी वे टूटे नहीं। ऐसे ही सेनानियों में एक थे सैयद सखावत हुसैन। सरकारी नौकरी छोड़कर वह आजादी की लड़ाई में कूदे और आदिवासी इलाके में आंदोलन को धार दी। अंग्रेजों की यातनाओं के आगे उनकी जान चली गई।
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मूल रूप से प्रयागराज के दमगड़ा जजला गांव के निवासी सैयद सखावत हुसैन दुद्धी स्टेट में पटवारी बनकर आए थे। बाद में मास्टरी, अराजय नवीसी और स्टांप फरोश भी हुए। सरकारी नौकरी में होने के बावजूद वह महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेते रहे। इतिहासकार दीपक केशरवानी बताते हैं कि महात्मा गांधी के स्वदेशी प्रचार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, लगानबंदी, नशाबंदी आंदोलनों में भाग लेने के कारण सैयद सखावत ब्रिटिश हुकूमत के आंखों की किरकिरी बन चुके थे। तब दुद्धी घने वन एवं वन्य जीवों से भरा एक पहाड़ी क्षेत्र था जहां आवागमन के संसाधन भी नहीं थे। इसके बावजूद दुद्धी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी युसुफ मसीह, रामानंद पांडेय, बेनी माधव पांडेय, पुरुषोत्तम सिंह, सुक्खन अली और सुखलाल खैरवार आदि के साथ सैयद सखावत अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आंदोलन का प्रचार प्रसार करते रहे। वर्ष 1922 में लगानबंदी आंदोलन करते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सरकारी कर्मचारी होने के कारण इन्हें जेल में शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी गईं। सरकार ने दुद्धी में उनकी समस्त संपत्ति जब्त कर उस पर पशु चिकित्सालय व सरकारी आवास बनवा दिया। उनके पौत्र हसन सोनभद्री के मुताबिक जेल में भयंकर यातनाओं से उनका शरीर पूरी तरह से टूट चुका था। इसके चलते जेल से रिहा होने के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया।
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