एशिया के बड़े जलाशयों में एक रिहंद जलाशय में जल्द ही चीन और वियतनाम के जलाशयों में पाई जाने वाली बड़ी मछलियों की अच्छी बढ़वार नजर आएगी।
इसको लेकर केंद्र सरकार के पायलट प्रोजेक्ट के जरिए रिहंद डैम में किए गए पिजड़ा मछली पालन ने उत्साहजनक परिणाम दिया है।
देश के विभिन्न हिस्सों से आए मत्स्य वैज्ञानिकों और शोध छात्रों के दल ने रविवार को इसका जायजा लिया और इसके लिए अपनाई जाने वाली तकनीक के बारे में जानकारी हासिल की।
रिहंद तट पर गोष्ठी के जरिए भी आसपास के लोगों को मत्स्य पालन की नवीनतम तकनीक से अवगत कराया गया।
दल की अगुवाई कर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. संदीप मल्होत्रा,
मत्स्य फेडरेशन केरल के पूर्व डीजीएम एवं केरल विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर के शोभना कुमार, वेनफिस बंगला की कल्पना मौलिक, मेरठ के प्रो. अशोक चौबे, कश्मीर के प्रो. अयाज अली ने बोट के जरिए मछली पालन स्थल पर पहुंचकर सहायक निदेशक मत्स्य अरविंद कुमार से
इसकी जानकारी ली और मछलियों को देखा। करीब डेढ़ साल के इस प्रोजेक्ट को सफल बताते हुए शोभना कुमार ने कहा कि रिहंद डैम के जिस हिस्से में मछलियां पाली जा रही हैं,
वहां का दृश्य प्राकृतिक सुषमा से भरपूर तो है ही, मछली उत्पादन के लिहाज से उपयुक्त है। अरविंद मिश्र ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के जरिए सिर्फ मछलियों का ही नहीं,
बल्कि मछलियों के बीज (अंगुलिकाओं) का भी उत्पादन लिया जाएगा। कहा कि फिलहाल पिजड़ों में कामन कार्प, ग्रास कार्प, रोहू और पयासी (पंगस) पाले गए हैं।
इसमें चीन में पाई जाने वाली ग्रास कार्प और वियतनाम के मेंकाग नदी में पाई जाने वाली पयासी मछली की अच्छी बढ़वार सामने आई है। मछलियों को पूर्ण रूप से विकसित होने में कुछ समय लगेगा। जुलाई में मछलियां और बीज बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे।