सोनभद्र। राबर्ट्सगंज नगर के आरटीएस क्लब मैदान में चल रहे श्रीरामचरित्र मानस नवाह्न पारायण महायज्ञ में मंगलवार की देर शाम सत्संग सभा का प्रारंभ करते हुए पंडित हेमंत त्रिपाठी ने दशरथ मरण की कथा सुनाए। बताया कि राजा दशरथ को पूर्व का श्राप जो श्रवण के माता-पिता ने दिया था। शब्द वेदी बाण से श्रवण की हत्या करने के कारण राजा दशरथ को राम जी के वियोग में अपना प्राण त्यागना पड़ा। राजा दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान देने को कहा था, उसी के बदले कैकेयी ने दो वरदान के रूप में राम को चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजगद्दी मांग ली थी। दिन में यज्ञ की परिक्रमा करने के लिए बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु पहुंचे।
पंडित देवी प्रसाद ने बाल्मीक आश्रम का वर्णन करते हुए कहा कि राम जी जब बाल्मीक आश्रम गये तब बाल्मीक जी ने राम जी का स्वागत किया और कंद मूल फल खाने को दिया जो भगवान को बहुत अच्छा लगा। भगवान ने भी बाल्मीक को प्रणाम करके धर्म मर्यादा के अनुपालन का नियम सिखा। सभी ऋषि मुनियों केक आश्रम में जा जाकर भगवान ने सब को सुख पहुंचाया। साथ ही बताया कि तुलसी का पौधा घर में लग जाने मात्र से वह घर भगवान को समर्पित हो जाता है। बानी प्रसाद बन जाता है, तैसे ही प्रत्येक वस्तु भगवान को समर्पित करके प्र्रसाद रूप में अपनाना चाहिए। जौनपुर से आये धर्मराज शास्त्री ने भरत चरित्र पर प्रकाश डाला। मंच संचालन करते हुए आचार्य संतोष कुमार द्विवेदी ने बताया कि पूरे विश्व पटल पर सिर्फ भारत को माता की उपाधि मिली है।