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Sonebhadra News: किसी को काम नहीं भाया तो कोई कम वेतन से 15 दिन में ही लौट आया

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सोनभद्र। युवाओं को रोजगार देने के लिए हर माह आयोजित हो रहे रोजगार मेले में बस आंकड़ों का खेल हो रहा है। मेले में आने वाली कंपनियां साक्षात्कार के जरिए युवाओं के चयन का दावा तो करती हैं, मगर सच्चाई इससे अलग है। चयनित अधिकांश युवा अब भी बेरोजगार हैं। किसी को वादे के मुताबिक काम नहीं मिला तो कोई कम वेतन होने के कारण 10-12 दिन ही घर लौट आया। बहुत से ऐसे युवा भी हैं, जो कंपनियाें से बुलावा आने का इंतजार कर रहे हैं।
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बेरोजगारी दूर करने के लिए सेवायोजन विभाग के माध्यम से हर माह रोजगार मेले लगाए जा रहे हैं। इन मेलाें में विभिन्न प्रांतों की कंपनियां साक्षात्कार के माध्यम से योग्य युवाओं का चयन कर उन्हें रोजगार देने का दावा करती हैं। सेवायोजन विभाग के मुताबिक पिछले पांच माह में कुल 11 मेलों का आयोजन किया गया, जिसमें 452 युवाओं का विभिन्न कंपनियों में चयन हुआ है। यह बात अलग है कि इनमें से ज्यादा युवाओं को रोजगार मिल नहीं पाया है। मेले में साक्षात्कार देने वाले युवाओं का कहना है कि कंपनियां साक्षात्कार लेते समय तो कई तरह के सब्जबाग दिखाती हैं, लेकिन वहां पहुंचने पर स्थिति अलग होती है। कहीं वेतन कम दिया जाता है तो कहीं काम ही उनकी योग्यता के अनुसार नहीं होता। लिहाजा रोजगार मेलों से अब उनका मोह टूट रहा है।
केस एक : घोरावल निवासी चंद्रप्रकाश विश्वकर्मा के मैकेनिकल में डिप्लोमा हैं। इसी आधार पर उनका चयन राजस्थान की कंपनी में हुआ था। चंद्रप्रकाश के मुताबिक वेतन 14000 रुपये देने को कहा गया था। वहां गए तो कम वेतन पर काम कराया जा रहा था, जो आठवीं, दसवीं पास अनट्रेंड लड़के कर रहे थे। आईडी मांगने पर अलग से शुल्क मांगा जाने लगा। लिहाजा काम छोड़कर घर आ गए।
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केस दो : राबर्ट्सगंज के दीपक इंटर पास हैं। रोजगार मेले में साक्षात्कार के जरिए हेल्थकेयर कंपनी ने उनका चयन किया। बताया कि उन्हें आठ हजार रुपये के साथ रहना-खाना देने की बात हुई थी। मौके पर जाने के बाद इससे मुकर गए। छह माह की ट्रेनिंग और ड्रेस चार्ज के रूप में 2100 रुपये पहले जमा करने को कहा गया। जिससे वापस चले आए।
केस तीन : रेणुकूट के नितेश तिवारी का चयन एक फर्टिलाइजर कंपनी ने किया था। 12वीं के बाद पॉलीटेक्निक करने वाले नितेश ने बताया कि उन्हें 12 हजार रुपये और खाना-पीना देने की बात हुई थी। काफी इंतजार के बाद भी फोन नहीं आया तो अब घर के आसपास की काम ढूंढ रहे हैं।
केस चार : ओबरा के प्रेम यादव, नागेंद्र कुमार, इंद्रजीत आदि का चयन एक स्थानीय कंपनी ने किया था। उन्हें सात से आठ हजार रुपये देने की बात हुई थी, लेकिन बाद में पांच हजार रुपये देने को कहने लगे। कुछ दिन काम करने के बाद उन्होंने उसे छोड़ दिया। अब दूसरे काम की तलाश में है।
केस पांच : करमा ब्लाॅक निवासी सुनील का चयन राजस्थान की एक फर्टिलाइजर कंपनी में हुआ था। उन्हें बताया गया था कि सोनभद्र-मिर्जापुर क्षेत्र में सेल्स से जुड़ा काम दिया जाएगा। कंपनी में गए तो पश्चिम यूपी में भेज दिया गया। उनके प्रमाण पत्र भी जमा करा लिया गया। वेतन की बजाय प्रोडक्ट बिकने पर कमीशन की बात कही जाने लगी। कुछ दिन काम करने के बाद तबीयत खराब हुई तो वह घर आ गए और अब दूसरा विकल्प ढूंढ रहे हैं।
बाहर की कंपनियों का सत्यापन निदेशालय स्तर से होता है। सत्यापित कंपनियों को ही मेले में आमंत्रित किया जाता है। पूरी कोशिश होती है कि युवाओं को अच्छा रोजगार दिलाया जा सके। अगर किसी को कंपनी स्तर से दिक्कत आती है तो वह शिकायत करें, जांच कर कार्रवाई की जाएगी। कम वेतन और घर से अधिक दूरी के कारण भी कई युवा छोड़कर चले आते हैं। - सूर्यकांत कुमार, सहायक निदेशक, सेवायोजन।
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पांच माह में आयोजित रोजगार मेले की स्थिति

माह: मेले की संख्या: चयनित अभ्यर्थी
मई: दो मेला: 72
जून: दो मेला: 91
जुलाई: तीन मेला: 138
अगस्त: तीन मेला: 104
सितंबर: एक मेला: 47
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