कुशीनगर की तरह जिले में भी रेलवे ने मौत के एक-दो नहीं बल्कि तीन दर्जन से अधिक मानव रहित क्रासिंग बना रखी है। यह खतरे के सिग्नल नजर आते हैं। गौरतलब है कि हादसे के वक्त तो रेल प्रशासन बड़ी-बड़ी घोषणाएं करता है लेकिन बाद में पुराने ढर्रे पर ही व्यवस्था चलती है। लगातार हादसों के बाद भी मानव रहित क्रासिंग को बंद नहीं किया जा सका है। इसके चलते कभी भी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता है।
चुनार-चोपन रेलखंड पर वैसे तो एक भी मानव रहित रेलवे क्रासिंग रेल प्रशासन के रिकार्ड में नहीं है लेकिन ग्रामीण सहूलियत के अनुसार जगह-जगह जान हथेली पर रख कर रेलवे लाइन पार करते हैं। रेल प्रशासन इन रेलवे क्रासिंगों की सुधि नहीं ले रहा और लोग जान गंवा रहे है। रेल प्रशासन इसे रेलवे क्रासिंग मानता ही नहीं। रेलवे अफसरों के दावों की माने तो चुनार -चोपन रूट पर कोई भी रेलवे क्रासिंग मानव रहित नहीं रहा है, लेकिन इसके उलट राबर्ट्सगंज ब्लाक के पकरी व पीथा गांव के पास कच्ची सड़क से लोग रेलवे लाइन पार कर रहे। इतना ही नहीं स्कूली बच्चे भी इसी रास्ते का उपयोग कर रहे हैं। हैरत की बात तो यह है कि यदि रेल प्रशासन के रिकार्ड में ऐसे क्रासिंग नहीं है तो उसे गेट लगाकर बंद क्यों नहीं किया जाता। ऐसे अवैध क्रासिंग पर किसी कर्मचारी तक को खड़ा नहीं किया जाता है। इन मानव रहित क्रासिंग पर रेलवे गेट न होने से हादसे लगातार हो रहे हैं। इसके बाद भी रेलवे सबक नहीं ले रहा है।