जिला अस्पताल की तर्ज पर अनपरा (डिबुलगंज) में स्थापित सौ बेड के संयुक्त चिकित्सालय में स्थापित प्रसव केंद्र के लिए अब तक समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है। बिजली गुल होने की दशा में इमरजेंसी लैंप की रोशनी में प्रसव कराना पड़ता है। वहीं वर्ष 2008 से अब तक यहां प्रसव के लिए आने वाली एक भी प्रसूताओं को नाश्ता या भोजन नसीब नहीं हो सका है। यह हाल तब है जब एनएचएम (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) कोटे से हर माह इस मद में लाखों की धनराशि खर्च की जाती है।
15 दिसंबर 2001 को सूबे के तत्कालीन सीएम राजनाथ सिंह ने अनपरा संयुक्त चिकित्सालय का लोकार्पण किया था। तब से अब तक यहां सुविधाओं का टोटा पड़ा हुआ है। विशेषज्ञ चिकित्सक एवं अन्य सुविधाओं की तो बात दूर, वर्ष 2008 में यहां स्थापित प्रसव केंद्र में 24 घंटे रोशनी की व्यवस्था के लिए एक जनरेटर तक नहीं है। बिजली कटने की दशा में अस्पताल के लिए उपयोग में लाए जाने वाले इनवर्टर से प्रसव केंद्र को भी रोशनी दी जाती है।
बिजली ज्यादा देर तक गुल रहती है तो यह यह व्यवस्था भी जवाब दे जाता है। अगर किसी प्रसूता को प्रसव पीड़ा शुरू होती है तो इमरजेंसी लैंप के सहारे प्रसव कराना मजबूरी बन जाती है। तपिश के दिनों में बिना पंखे और कूलर के यहां आने वाली प्रसूताओं का तड़पना आम बात है। आंकड़े बताते हैं कि यहां हर माह 55 से 60 प्रसव होता है। बावजूद अब तक यहां भर्ती की जाने वाली प्रसूताओं के नाश्ते-भोजन का भी प्रबंध नहीं किया जा सका है।
जबकि स्वास्थ्य महकमे की गाइडलाइन में इसका स्पष्ट प्रावधान होने के साथ ही प्रतिमाह इसके लिए लाखों का बजट भी निर्धारित रहता है। नीरा, सुनीता, कस देवी और बीगन ने बताया कि अस्पताल में उन्हें भोजन नहीं दिया जाता है। हम लोग घर से मंगाकर भोजन आदि की व्यवस्था करते हैं।