मेडिकल कालेज के अधीन आने के बाद जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं मेंं लगातार सुधार हो रहा है। अब फेफड़े की क्षमता जांचने के साथ ही फेफड़े से पानी निकालने, मवाद का उपचार सहित अन्य सेवाएं भी मिलेंगी। इसके साथ ही दिमागी बुखार की भी पहचान हो सकेगी।
आदिवासी बहुल जिले में आज भी कई जरूरी सेवाओं के लिए लोग वाराणसी सहित अन्य जिलों के अस्पतालों पर निर्भर हैं। हालांकि जिले में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के साथ ही संसाधनों में बढ़ोतरी हो रही है। धूम्रपान करने वालों, कोरोना से ग्रस्त रहे लोगों और बुजुर्गों में फेफड़ों से संबंधित बीमारी बढ़ रही है। इसके उपचार के लिए लोगों को अब वाराणसी तक का चक्कर नहीं लगाना होगा।
जिला अस्पताल में ही अब फेफड़ों की जांच हो जाएगी। इसके लिए स्पाईरोेमेट्री जांच शुरू हो गई है। जिसमें फेफड़ों की क्षमता मापी जाएगी। ऐसे में समय से उपचार मिलने से फेफड़ों के मरीजों को सांस लेने में होने वाली तकलीफ को कम करने के साथ ही ह्रदय की गति बढ़ने की समस्या को भी नियंत्रित किया जा सकेगा। जिससे हार्ट फेल होने का खतरा कम होगा।
ये सुविधाएं भी मिलेंगी
जिला अस्पताल में रोजाना फेफड़ों के मरीजों में पल्मोनरी फंक्शन टेस्टिंंग की स्पाईरोमेट्री जांच की जा रही है। इस जांच में मरीजों के फेफड़ों में फूलने और सिकुड़ने की क्षमता का आंकलन किया जाता है। जिससे सीओपीडी और अस्थमा रोग का उपचार भी आसान हुआ है। इससे फेफड़ों का टीएलसी (टेस्ट फॉर लंग्स कैपेसिटी) का भी पता लगाया जा सकता है। वहीं जिला अस्पताल में अब थोरेसिक एमपाइमा यानि छाती के अंदर पस यानी मवाद इकट्ठा होने और फेफड़े फटने की स्थिति वाले मरीजों को भी उपचार मिलना शुरू हो गया है। इस सेवाओं में बढ़ोतरी से टीबी मरीजों के उपचार में बेहतर परिणाम मिलेंगे।