सोनभद्र। खेलों को बढ़ावा देने पर सरकार का जोर है। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए कई सुविधाएं दी जा रही हैं, लेकिन उन्हें खेलने के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही। खेल प्रतिभाओं से भरे सोनांचल में खिलाड़ियों की यह सबसे बड़ी पीड़ा है। जिले में खिलाड़ियों के लिए अच्छे खेल मैदान ही नहीं है। खेलने के लिए उन्हें कई किमी दूर जाना पड़ रहा है तो कई खिलाड़ी घर-परिवार छोड़ने को विवश हो रहे हैं। मजबूरी में कोई पहाड़ी पर हॉकी खेल रहा है तो किसी ने खेत-खलिहान को ही क्रिकेट का मैदान बना लिया है। गांवों में खेल मैदान के लिए आरक्षित भूमि देख-रेख के अभाव में झाड़ झंखाड़ में तब्दील है। कइयों पर अतिक्रमण हो चुका है।
जंगल और पहाड़ों से आच्छादित सोनभद्र भौगोलिक रूप से प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद यहां के कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता के झंडे गाड़े हैं। आदिवासी बहुल अंचल में खेल प्रतिभाओं की भरमार है, मगर सुविधाओं के अभाव में उन्हें निखरने का मौका नहीं मिल रहा। सबसे बड़ी समस्या खेल मैदान की है। करीब डेढ़ सौ किमी लंबे परिक्षेत्र वाले जिले में मुख्यालय पर तियरा में खेल विभाग का एक विशिष्ट स्टेडियम है। इसके अलावा कोयला व बिजली परियोजनाओं में भी स्टेडियम निर्मित हैं, लेकिन उनका उपयोग कर्मचारी व उनके परिवार ही कर पाते हैं। अन्य खिलाड़ियों के लिए स्टेडियम के नाम पर खेत-खलिहान और उबड़-खाबड़ पहाड़ी ही है। एक-दो जगहों पर युवा कल्याण विभाग से मिनी स्टेडियम बने भी हैं तो उन्हें कोई पूछने वाला ही नहीं है। देखरेख न होने से उनमें झाड़ियां उग आई हैं, जिनके बीच विषैले जानवरों ने ठिकाना बना लिया है। नगर से सटे चुर्क में जिस मैदान पर बच्चे हॉकी खेलते हैं, वह एक पहाड़ी है। खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत से कुछ हिस्से को जैसे-तैसे समतल कर खेलने लायक बनाया है। उबड़-खाबड़ जमीन पर कई बड़े पत्थर खड़े हैं तो कहीं कंक्रीट बिखरी हुई है। इस पर खेलते हुए अक्सर खिलाड़ी चोटिल हो रहे हैं। इसी मैदान पर खेलकर कई खिलाड़ियों न स्पोर्ट्स हॉस्टल में प्रवेश पाया है। हॉकी खिलाड़ी अमरजीत यादव ने बताया कि पहाड़ी के कुछ हिस्से को ही खेलने लायक बनाया जा सका। फिर भी जमीन पूरी तरह समतल नहीं है। हॉकी लेकर बाल के पीछे दौड़ते समय अक्सर घटनाएं होती है। कई बार खेल मैदान के लिए जिला प्रशासन से गुहार लगाई गई, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। विभाग की ओर से निर्मित मिनी स्टेडियम घास-फूस और झाड़ियों से पटा पड़ा है। इसकी हालत बताती है कि लंबे समय से यहां कोई झांकने नहीं आया। मिनी स्टेडियम का निर्माण वर्ष 2002 में हुआ था। तब इस पर 22 लाख रुपये खर्च हुए थे। कई वर्षों से न तो ब्लॉक स्तर और न ही जिला स्तर की कोई खेलकूद प्रतियोगिता यहां हुई है। इसी स्टेडियम में अभ्यास कर वर्ष 2013-2014 में कबड्डी कोच आशीष सिंह पटेल ने अरविंद सिंह पटेल, विजय कुमार, विनोद कुमार, विवेक कुमार आदि खिलाड़ी को राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भी शामिल कराया था। जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण यह स्टेडियम मौजूदा समय में सिर्फ शोपीस बनकर रह गया है। कागजों में अमूमन हर दूसरे गांव में खेल मैदान के लिए जमीन चिह्नित है, मगर अधिकांश स्थानों पर उनका धरातल पर अस्तित्व नहीं है। खेल मैदान की जमीन को लोगों ने कब्जा लिया है। सदर तहसील क्षेत्र के लोहरा गांव में वर्षों से गुम हो चुके खेल मैदान के लिए युवक मंगल दल ने संघर्ष किया तब जाकर उसे आरक्षित कराने में सफलता मिली। पास के ही गौराही गांव में भी खेल मैदान की भूमि पर अतिक्रमण हावी है। युवक मंगल दल के मनोज दीक्षित बताते हैं कि खेल मैदान को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए लगातार गुहार लगाई जा रही है। कई बार ज्ञापन भी सौंपा गया, मगर अब तक सफलता नहीं ीमिली है। खेल मैदान मिल जाता तो ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलता।
सीडीओ सौरभ गंगवार ने बताया कि खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। गांवों में जहां भी खेल मैदान बदहाल हैं या अतिक्रमण के शिकार हैं, उसके बारे में जानकारी लेकर दुरुस्त कराया जाएगा, ताकि खिलाड़ियों को अच्छा मौका मिल सके।