बनवासी सेवा आश्रम स्थित केंद्र पर बुनाई के लिए धागों की ट्वीस्टिंग (दो धागों को एक में पिरोना)
सोनभद्र। आधुनिक फैशन और बड़े ब्रांडों की चमक के बीच सोनभद्र का एक गांव 46 साल से खादी की विरासत संभाले हुए है। न बड़ी ब्रांडिंग, न तामझाम और न ही आलीशान शोरूम। इसके बावजूद म्योरपुर के गोविंदपुर से हर साल 15 लाख मीटर से अधिक खादी के कपड़े का कारोबार होता है। हाल के वर्षों में खादी की मांग करीब 25 फीसदी बढ़ी है। हालांकि बढ़ती लागत और बुनकरों की कमी कारोबार के विस्तार में बड़ी बाधा बनी हुई है। म्योरपुर क्षेत्र के गोविंदपुर में वनवासी सेवा आश्रम ने वर्ष 1979-80 में खादी कारोबार की शुरुआत की थी। यहां तैयार खादी सोनभद्र के अलावा वाराणसी और गोरखपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों तक पहुंचती है। कभी चंडीगढ़ तक इसकी आपूर्ति होती थी, लेकिन लोगों की पसंद बदलने से यह सिलसिला बंद हो गया। यहां सूती खादी में कुर्ता-पायजामा, लुंगी, साड़ी, गमछा और धोती के अलावा सिल्क के कपड़े, स्टॉल और शॉल तैयार किए जाते हैं। रेडीमेड कपड़े भी उपलब्ध हैं। प्रबंधन के अनुसार खादी की मांग बढ़ी है, लेकिन आधुनिक उपकरणों के अभाव और कुशल बुनकरों की कमी से उत्पादन बढ़ाना चुनौती बना हुआ है।