सोनभद्र। देश के अलग-अलग प्रांतों में परिवार की आजीविका चलाने के उद्देश्य से कमाने गए प्रवासी श्रमिकों के हाथ लॉकडाउन में खाली हो गए है और वे अब अपने घरों को लौट रहे हैं। श्रमिकों का कहना है कि लॉकडाउन में कंपनियों में काम बंद होने से उनके सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि वह कमाने के उद्देश्य से तो बाहर गए थे लेकिन लॉकडाउन में बचे रुपये भी खत्म हो गए। अब बस किसी तरह घर पहुंच जाएं। महामारी खत्म होने तक अपने क्षेत्र में ही मेहनत मजदूरी करके परिवार की आजीविका चलाएंगे। हरियाणा से अपने घर झारखंड जा रही फूलकुमारी देवी मंगलवार को राबट्र्सगंज पहुंची। उनका कहना था कि वह झारखंड प्रांत के पलामू जिले के खरौंधा पाटन की रहने वाली है। वह परिवार के साथ चार माह पूर्व हरियाणा जाकर एक कंपनी में मेहनत मजदूरी करती थी। 25 मार्च को लॉकडाउन होने के बाद वह परिवार के साथ वहीं रुकी रहीं। चार दिन पहले परिवार के घर के लिए पैदल चली, रास्ते में थर्मल स्क्रीनिंग करके ट्रेन व बस से यहां तक छोड़ा गया। रास्ते में दो दिन भोजन नहीं मिला। लाई, चना खाकर परिवार के लोग रहे। झारखंड के पलामू जिले के ही रहने वाले छोटूराम का कहना है कि वह हरियाणा के एक कंपनी में मजदूरी करता था। देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढने से घरवाले चिंतित हो गए थे। घरवालों के बार-बार कहने पर घर लौट रहा हूं। ताकि परिवार में सुरक्षित रह सकूं। हम सुरक्षित रहेंगे तो न जाने कितनी कमाई होगी। फिलहाल घर पहुंचना है। ये श्रमिक हरियाणा से ट्रेन के जरिए इटावा पहुंचे थे, वहां से ट्रेन के जरिए वाराणसी फिर राबर्ट्सगंज पहुंचे थे।
प्रवासी श्रमिकों को मिले आर्थिक सहयोग
सोनभद्र। लॉकडाउन में हरियाणा से घर लौट रहे मजदूर छोटूराम का कहना है कि कोरोना वायरस के फैलाव पर रोक के लिए जारी लॉकडाउन में प्रवासी श्रमिकों के सामने आर्थिक समस्या उत्पन्न हो गई है। क्षेत्र में काम न कर पाने की वजह से ही वह बाहर जाकर मेहनत मजदूरी करते है। लेकिन अब वह घर लौटकर सिर्फ खेतीबारी पर ही आश्रित हो जाएंगे। प्रकृति के साथ नहीं होने पर पूरे मेहनत पर पानी फिर जाता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों की आर्थिक मदद की जाए या फिर उन्हे काम दिया जाए। महिला कामगार फूलकुमारी ने भी आर्थिक मदद की मांग की।