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भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है समरसता: जगदीश पंथी

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राबर्ट्सगंज में गीता जयंती समारोह को संबोधित करते कवि जगदीश पंथी। - फोटो : SONBHADRA
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सोनभद्र। समरसता भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है। सदियों से हमारे ऋषि-मुनियों ने सांमजस्यपूर्ण श्रेष्ठ संस्कृति से युक्त, समता मूलक समाज के लिए सतत प्रयास किया लेकिन दुर्भाग्यवश अपने गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर देने के कारण आर परस्पर सौहार्द एवं समरसता का समाज में अभाव है। ये बातें वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश पंथी ने गीता जयंती पर शुक्रवार को राबर्ट्र्सगंज के जयप्रभा मंडपम में गीता में सामाजिक समरसता विषय पर आयोजित गोष्ठी में कहीं।
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गीता जयंती समारोह समिति की ओर से आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ संयोजक डॉ.वी सिंह एवं वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व चेयरमैन अजय शेखर ने स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस दौरान यथार्थ गीता के प्रचारक रहे प्रेमनाथ चौबे को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उन्होंने कहा कि विश्व में शाश्वत शांति, स्थिरता तथा समरसता की कुंजी गीता में मौजूद है। गीता से विश्व समुदाय आतंकवाद तथा भेदभाव जैसी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकता है। अरुण चौबे ने कहा कि धर्मशास्त्र को विस्मृत कर देने के कारण आज का समाज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ समाज है। हम जातियों को तथा मजहबों को ही सत्य मानकर परस्पर द्वेष कर रहे हैं, जबकि गीता के अनुसार सभी मनुष्य परमात्मा के विशुद्ध अंश हैं। प्रत्येक मानव उतना ही पावन है, जितना स्वयं भगवान, फिर कोई ऊंच, कोई नीच कैसे हो सकता है।
गोष्ठी को बालेश्वर यादव, प्रमोद मिश्रा, डॉ. ओमप्रकाश त्रिपाठी ने संबोधित किया। इस दौरान न्यायपालिका से सेवानिवृत्त विनोद कुमार श्रीवास्तव, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य पारसनाथ मिश्र, पीयूष त्रिपाठी, किसान राणाप्रताप सिंह, समाजसेवी विनोद कुमार दूबे तथा इंद्रदेव मौर्य को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। डा.कुसुमाकर ने धन्यवाद ज्ञापित किया। गोष्ठी के दौरान उन्होंने गरीबों में कंबल वितरित किया। इस मौके पर सुशील चौबे, उमाकांत मिश्र, रतनलाल गर्ग, ख़ुर्शीद आलम, रमाशंकर चौबे, रामजनम, मनोज कुमार शुक्ला, राजू तिवारी, रवि पाल, गणेश पाठक, चंद्रकांत तिवारी, सत्यनारायण मेहता, दिलीप त्रिपाठी, ईश्वर विरागी, आशुतोष आदि, सुधीर मिश्रा, विकास चौबे आदि मौजूद रहे। संचालन भोलानाथ मिश्र ने किया।
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