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गेहूं की खेती पर कुहासा, खाद-बीज के लिए धन नहीं

Fri, 09 Dec 2016 11:07 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/सोनभद्र
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नोटबंदी से गेहूं की खेती पर भ्‍ाा कुहासा छाने जैसे हालात हैं। किसानो के पास खाद-बीज के लिए धन नहीं है। इसी तरह से धान क्रय केंद्रों तक धान ले जाने के लिए मजदूरों को मजदूरी देने के लिए भी किसानों परेशान हैं। आगामी फसल के लिए खेतों की जुताई, सिंचाई, कुड़ाई के लिए मजदूरों को भुगतान की समस्या किसानों के सामने है। छोटे किसान तो अपने से काम कर खेती में कुछ कर ले रहे हैं। लेकिन बड़े जोतों के मालिक जो मजदूरी पर ही निर्भर करते हैं, उनके खेतों में अब तक जोताई तक नहीं हो पाई है। किसानों का कहना है कि बैंकों से एक बार में दस हजार रुपये से अधिक नहीं मिल रहा, जिससे खाद-बीज खरीदा जा सके और मजदूरों का भुगतान हो सके।
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आगामी खेती का काम शुरू हो गया है ऐसे में किसानों को खाद, बीज की खरीद में पैसे का संकट आड़े आ रहा है। अब गेहूं, चना, मटर, सरसों, तीसी आदि की खेती होनी है। साथ ही धान क्रय केंद्रों पर किसानों को धान ले जाने के लिए मजदूरी देनी है। ऐसे में किसानों के पास पैसा न होने से परेशानी है। पलिया कला के किसान इकरार बेग का कहना है कि धान क्रय केंद्र तक धान ले जाने के लिए वाहनों पर लेबरों से लोडिंग कराई जा रही। लेकिन उनको देने के लिए पैसा नहीं है। बैंकों से लेनदेन कम हो रहा और एटीएम पर काफी भीड़ है। इससे कृषि से जुड़ा हर काम प्रभावित हो रहा है। मझगांव मिश्र के लोलार्क नाथ मिश्रा का कहना है कि क्रय केंद्रों पर नंबरिंग की व्यवस्था है। नंबर भी जल्दी नहीं लग पा रहा। ऐसे में तत्काल पैसे की जरूरत को पूूरा करने के लिए धान खुले बाजार में कम दाम पर बेचना पड़ रहा है। पुसौली के संतोष कुमार सिंह पटेल का कहना है कि धान की कटाई, वाहनों पर लोडिंग का चार्ज चेक से नहीं दिया जा सकता। मजदूर को नकद और फुटकर पैसा ही चाहिए। इसलिए दिक्कत झेलनी पड़ रही है। पुसौली गांव के ही श्याम सिंह का कहना था कि केंद्र सरकार को नियम तैयार करने से पहले किसानों समेत हर वर्ग के लोगों की समस्या के निदान का इंतजाम करना चाहिए था।
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