जरूरत से अधिक काला और जगह-जगह दिखती सफेदी फेफड़ों में मवाद और फेफड़े के फटने दोनों के लक्षण दर्
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सोनभद्र। भागदौड़ भरी जिंदगी लोगों की सांसों पर भारी पड़ने लगी है। एक तरफ जहां प्रदूषण और तनाव के कारण फेफड़ों की सेहत लगातार बिगड़ रही है, वहीं बढ़ते संक्रमण की वजह से फेफड़ों के फटने (लीकेज) और मवाद भरने के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। स्थिति यह है कि जिला मेडिकल कॉलेज में हर महीने ऐसे 4 से 5 गंभीर मरीज पहुंच रहे हैं, जिनके फेफड़े फटे हुए मिल रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, समय रहते बीमारी का पता चलने पर ऑपरेशन के जरिए मरीजों की जान बचा ली जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि फेफड़े खराब होने की यह समस्या अब सिर्फ 50 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। अनियमित दिनचर्या, खराब खान-पान और बीमारी के प्रति जागरूकता की कमी को इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। फेफड़ों की गंभीर स्थिति के चलते पिछले महज दो महीनों में 5 ऐसे टीबी मरीजों की मौत हो चुकी है, जिनकी उम्र केवल 22 से 30 वर्ष के बीच थी। डॉक्टरों ने युवाओं से अपील की है कि वे अपनी लाइफस्टाइल में सुधार करें और फेफड़ों से जुड़ी किसी भी समस्या को हल्के में न लें। शाहगंज क्षेत्र का 22 वर्षीय युवक 15 दिन पूर्व मेडिकल कॉलेज के श्वास रोग विभाग पहुंचा। हालत गंभीर देखते हुए तत्काल जांच कराई गई। पता चला कि उसका फेफड़ा तो फटा है ही, मवाद से भी दोनों फेफड़े भरे हुए हैं। तत्काल ऑपरेशन किया गया और फेफड़े में नली लगा मवाद निकाला गया। तीन दिन में 4.5 लीटर निकली मवाद ने डॉक्टरों को भी हतप्रभ कर दिया। 15 दिन तक भर्ती रखते हुए सात लीटर मवाद निकाली गई। स्थिति में सुधार आने के बाद जरूरी हिदायत देते हुए छुट्टी दी गई। घोरावल क्षेत्र की एक 65 वर्षीय महिला के फेफड़े में मवाद भरा हुआ था। इसके चलते बुखार, सीने में दर्द की शिकायत लगातार बनी हुई थी। वाराणसी जाकर ऑपरेशन कराने के बाद भी राहत नहीं मिलने पर पिछले माह मेडिकल कॉलेज में दिखाया गया। पता चला कि अभी भी फेफड़े में लीकेज (फटने) की शिकायत बनी हुई है। दोबारा ऑपरेशन कर पूरी मवाद निकाली गई। एक हफ्ते तक भर्ती रखने के बाद छुट्टी दी गई। श्वांस रोग विभाग में ओबरा क्षेत्र से 12 साल का एक ऐसा बच्चा पहुंचा जिसका एक फेफड़ा खराब था और उसमें मवाद भरा हुआ था। स्थिति यह थी कि जरा सा चलने पर ही उसकी सांसें फूलनी लगती थीं। स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों ने टीबी की आशंका जता डाली थी। जांच में पता चला कि बैक्टीरियल संक्रमण के कारण ऐसा हुआ है। मेडिकल कॉलेज के श्वांस रोग विभाग में फेफड़ों में दिक्कत की शिकायत लेकर हर दिन 100 से 150 मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें 50 से 60 मरीजों में गंभीर संक्रमण मिल रहा है। मौसम बदलाव के वक्त मरीजों की संख्या डेढ़ गुना तक बढ़ जा रही है। औद्योगिक, खनन व प्रदूषण प्रभावित इलाकों से आने वालों में संक्रमण की स्थिति तो है ही, पोषण भरा खान-पान न होने के कारण गरीब तबके में भी सीओपीडी (फेफड़ों की गंभीर और लंबी बीमारी) का संक्रमण बढ़ रहा है। टीबी, ऑक्यूपेशनल अस्थमा के साथ सिलिकोट्यूबरक्लोसिस की भी शिकायत बढ़ने लगीं हैं। फ्लोरोसिस (पानी में फ्लोराइड की अधिकता) वाले इलाके भी हाई रिस्कजोन में हैं। विभागीय आंकड़े बताते हैं कि एक जनवरी से जुलाई तक टीबी के कुल 2689 नए मरीज चिह्नित किए गए। इस दरम्यान 100 दिन के चलाए गए विशेष अभियान में प्रत्येक शिविर औसतन 124 व्यक्तियों की जांच करते हुए 44151 का चेकअप किया गया। अप्रैल में 366, मई में 402, जून में 426, जुलाई में 351 कुल 1541 मरीज सामने आए। चौंकाने वाली बात यह रही कि कई मरीज ऐसे मिले जिनमें बगैर लक्षण के टीबी का संक्रमण तो पाया ही गया, फेफड़ों की भी स्थिति खराब मिली। आम भाषा में फेफड़ा फटने या सिकुड़ने की स्थिति को न्यूमोथोरैक्स कहा जाता है। इसमें फेफड़े और छाती की दीवार के बीच की जगह में हवा भर जाती है। इससे फेफड़े पर दबाव पड़ता है। फेफड़ा पूरी तरह या आधा पिचक जाता है। सांस लेने में भारी दिक्कत होती है। सीने में तेज और अचानक दर्द उठता है।